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Showing posts from November, 2019

समाज के नींव

विश्वविद्यालय के परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों में गुजरने वाले छात्राओं को देखकर वहीं काम करने वाले दो मजदूर एक मां और पंद्रह बरस की उसकी बेटी उन्हें निहार रहे थे अपनी प्यासी आंखो से अपने किस्मत को कोस रहे थे मन के घने अंधेरे में। और वहीं युवा जिनके कंधो पर  समाज की जिम्मेदारियां हैं उन जैसे गरीब, असहाय, अशिक्षित मलिन शरीर वाले मटमैले कपड़ों वाले कोमल मन वाले, पर एक नज़र डालने से भी कतराते हैं। जो अपनी मेहनत और त्याग से पसीने की एक एक बूंद से भूखे पीट से, सूखे ओठ से बदन के दर्द से, माघ के सर्द से बच्चों की चीख से, मांगे हुए भीख से टूटे सपनों से, रूठे अपनों से दिन के अन्धकार से, तन के बुखार से मन की हताशा से, फिर बंधकर एक आशा से समाज को संबृद्ध बनाते हैं और वही उन्नतशील समाज क्यों उनको भूल जाते हैं।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

कबाड़ बिनने वाले

बेकार समझकर हम तुम जिन वस्तुओं को फेक देते हैं उन्ही से वस्तुओं वो लोग  अपना जीवन चलाते हैं। गंदगी समझकर हम जहां पैर रखने से भी कतराते हैं वहीं रहकर वो सभी लोग अपना सारा जीवन बिताते हैं। पोषण न रहे खाने में शोषित रहे जमाने में दो जून की रोटी कमाने में फिरते रहते हैं वो मलखानें में। पास आते देखकर उन्हें हम दूर भाग तो जाते हैं हमसे हुई दशा यह उनकी फिर भी न हम पछताते हैं। मैला कपड़ा, भद्दा सा रंग सूखा सा मुख, झोली संग गंदे हाथों से खाने का ढंग यही है उनके जीवन का संगम।                    🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

भाषा का प्रवाह

भाषा नदी की धार सी निरन्तर बढ़ती चली जाती हैं जब तक कोई सैलाब ना आ जाए पर्वतों को उखाड़-उखाड़ कर वनों को चीर-चीर कर मैदानों को रेत सा बहाकर। जब मानसून चला जाता है पर्वत स्थिर होने लगते हैं वन हरे-भरे से हो जाते हैं और मैदानों को समतल करके कागज पर स्याही सी बहती हैं। मार्ग में आए जब कोई बाधा एक नया मोड़ लेती वह व्याधा फिर से बढ़ चलती हैं नये गगन में, नये चमन में नयी रूप सी, नये बसन्त में नयी कली सी, नये वतन में नयी चमक सी, नये जनम में।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

तब बहेगा पसीना

जब चमचमाती धूप में पैरों से रिक्शा खींचोगे तब बहेगा पसीना। जब भरी दोपहरी में पैर अपने घिसाओगे  तब बहेगा पसीना। जब आग के सामने चूल्हे में रोटी सेंकोगे तब बहेगा पसीना। जब चिलचिलाती धूप में पेड़ों के छांव पड़ेगा सोना तब बहेगा पसीना। जब सुबह शाम फावड़ा लेकर बनाओगे तुम सब खेत मेड तब बहेगा पसीना। जब कोयले के आग के सामने बेचोगे तुम सब छोला-भटुरा तब बहेगा पसीना। जब खाली पेट में तुम्हारे चूहे कूदेंगे  तब बहेगा पसीना। जब दस रुपए बचने के लिए दो तीन किमी पैदल चलोगे तब बहेगा पसीना। AC के कमरों में बैठकर नहीं बहता है पसीना। ख़ुद कूड़ा गिराकर फिर  उसी की सफाई करने पर नहीं बहता है पसीना। रिश्वत के पैसे खा कर नहीं बहता हैं पसीना।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बनता है तमाशा

जब लंगड़ा चलता है एक पैर पर, तब उसका बनता है तमाशा । जब गूंगा बोलता है बेसुरा, तब उसका बनता है तमाशा । जब कागज की कश्ती पर, कोई सागर पार करने के सपने देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब पंछी के पंखों के सहारे, कोई उड़ने  का ख़्वाब देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब एक नादान बालक,  उम्र भर सच बोलने का प्रण ले,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक अंधा आदमी, किसी को राह बताए,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक वृद्ध ख्वाबों के लिए रोए, तब उसका बनता है तमाशा । जब कोई पागल राजगद्दी की भूख बोए, तब उसका बनता है तमाशा ।             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

लेखनी जब भी चलती हैं

स्याह रातों में शब्द उकेरते है जब भी मन को तो वो रात ही लाखों लोगों के जीवन के अधेरें को मिटाती चली जाती हैं। लेखनी जब भी चलती हैं एक नवनिर्माण करती हैं उस रात के लेखनी में सूरज का तेज भी  मंद पड़ जाता है।             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

घमंड

हे धनपतियों कुबेर के समदृश्य हे शक्तिपतियों इन्द्र-दर्प युक्त सिर्फ तुमसे ही यह काल नहीं सिर्फ तुमसे ही यह जीवन नहीं तुम बस एक पांसे हो काल के जब चाहे तुम्हें वह तोड़ दे बुद्धि उसकी है, युक्ति उसकी है जब चाहे तब गति मोड़ दे   भूल से भी इस घमंड में न रहना कि तुम सब कुछ जीत लोगे अंत समय जब आयेगा तुम्हारा घमंड चूर-चूर हो जायेगा विश्वास न हो तो इतिहास देखो अगर फिर भी न हो तो राह देखो जब गिनेंगीं सांसें आखिरी गिनती याद आयेगी तब मेरी यह विनती             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

जिंदगी नाम है

जिंदगी नाम है।  अनेक संघर्षों का,  अनेक समस्याओं का।।  जिंदगी नाम है।  अनेक खुशियों का,  अनेक दुखों का।।  जिंदगी नाम है।  अनेक उपकारों का,  अनेक परोपकारों का।।  जिंदगी नाम है।  अनेक निराशाओं का,  अनेक आशाओं का।।  जिंदगी नाम है‌  सत्य का, असत्य का,  हिंसा का, अहिंसा का।।  जिंदगी नाम है,  सम्मान का, मान का,  स्वाभिमान का, अभिमान का।।  जिंदगी नाम है,  प्रेम का, करूणा का,  छल का, शील का।‌।  जिंदगी नाम है।  डर का, निडरता का,  पवित्रता का, विनम्रता का।।  जिंदगी नाम है।  दया का, धर्म का,  दान का, दयालुता का।‌  जिंदगी नाम है।  शोक का, क्रोध का,  सजगता का, सरलता का।।  जिंदगी नाम है।  चंचलता का, मूर्खता का,  सजता का, सतर्कता का।।  जिंदगी नाम है,  मनन का, चिंतन का,  बुद्ध के परिवर्तन का।।  जिंदगी नाम है,  मिलन का, बिछुड़न का, आगमन का, प्रतिगमन का।।  जिंदगी नाम है।  उपाय का, भटकाव का,  अनजाने रुका का।।...

मैला आंचल

वह स्टेशन जो था उनके घर की कमी को एहसास नहीं होने देता था। एक औरत मैले कपड़ों से युक्त पसीने से भीगी, नहाने को तरसी कंघी न बालों में, चप्पल न पैरो में ढूंढती किसी अपने को भीड़ भरे गैरो में शायद कोई मिल जाए आज की भूख मिटाने वाला। गोद में एक बच्चा और बगल में टहलती एक,  एक बरष की छोटी बच्ची पेट में जकड़न, मन में तडपन लिए जब रो कर मां की तरफ निगाह फेरती हैं ममता को दबाए हुए,करुणा को हटाए हुए मन को ससक्त कर, हृदय को विशक्त कर  वह जोरों से उस बच्ची को एक जोर का थप्पड़ तान देती है। जब बच्ची फफक कर रोनें लगती है कुछ दूर जाकर, फिर वापस आकर मां के आंचल से लिपट जाती हैं मां की ममता जब जाग जाती हैं क्रोध से तब वह दूर भाग जाती हैं पुचकार कर उस बच्ची को आंसूओं की कश्ती को अपने आंचल में समेट लेती हैं। उस ममता में, वह मैला आंचल स्वर्ण से भी ज्यादा कान्तिमय हो जाता है हीरे से भी ज्यादा चमकदार हो जाता है उस सुखकारी वस्त्र, की कीमत भगवान भी नहीं दे सकता है।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

प्यार कर तू

हां प्यार कर तू प्यार कर और प्यार भी बेशुमार कर मुझसे नहीं तो किसी और से तू प्यार का तो इजहार कर। रगो में बहने दे प्यार को सांसों में चलने दे प्यार को प्यार में जान तू न्योछार कर हा प्यार कर बस तू प्यार कर। धड़कने भी धड़के तो वो प्यार में आंखे फड़के भी तो वो प्यार में प्यार में जीवन अपना तू वार कर हा प्यार कर तू प्यार सिर्फ कर। किसी को देकर अपना दिल लेकर उसका तू चैन करार आशिकों पर अपना दिल हारकर बस प्यार कर तू प्यार कर।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बचपना छीन गया हमसे

बचपन हमारा खो गया हमसे जैसे एक प्यारा सा सपना खो गया हमसे हमें रुलाई आयी साथ में तन्हाई लाई हमारे आंखों में आंसू नहीं थे और याद आ रहा था वो जो दोस्त हमसे कहे थे रोओगे तुम बहुत एक दिन जब हम चले जाएंगे तुमसे बहुत दूर होंगी सारी खुशियां जमाने की तुम्हारे पास पर हमारे बिना तुम्हें कुछ न सुहाएगा कहीं दूर आसमा में  कोई परिंदा गाएगा बचपना छीन गया हमासें वो अपने यार पीछे छूट गए हमसे                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

समूह में

ये क्या है  क्या किसी को पता है  यूं सरेआम किसी को पीट देना  किसी को गालियां दे देना  तुम्हारे साथ कुछ लोग हैं  तो क्या तुम कुछ भी करोगे  किसी निहत्थे को, असहाय को  सरेआम पीटा करोगे  यह जो तुम्हारी सोच है  कि तुम जन समर्पित हो, शक्ति युक्त हो  पर जरा यह बताओ मुझें  अगर अकेले होते तुम  तो क्या ऐसा ही व्यवहार करते हैं  उस अकेले, निस्सहाय व्यक्ति के साथ  शायद नहीं  आराम से बातें करते  बातों से हल ढूंढते  जो एक सर्वमान्य तरीका है  यही मानवता का आधार है                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

देश है

देश सिर्फ आप कुछ चुने हुए  धनाढ्यों व राजनेताओं से नहीं है  देश है मजदूरों से  देश है किसानों से  देश है अपंग व अनाथों से  देश है शोषित व कुपोषित हाथों से  देश है गूंगे और बहरों से  देश है गांव और शहरों से  देश है नदियों और तालाबों से  देश है कुछ गंदे मलबों से  देश है पेड़-पहाड़ों से  देश है सुंदर नजारों से  देश है रंग-बिरंगे फूलों से  देश है सावन -भादो के झूलों से  देश है मेले और मल्हारों से  देश है सभ्यजन के संस्कारों से                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

दोस्ती - धर्म और विज्ञान की

हो अगर विज्ञान में धर्म या हो धर्म में विज्ञान तो क्या कोई कर सकता है सतत् विकास से संग्राम फलती-फूलती संस्कृति होगी बढ़ता-चढ़ता धर्म होगा अच्छा या बुरा नहीं  कर्म तो सिर्फ कर्म होगा न मानवता पर कलंक लगेगा ना मंदिर तोड़े जायेगें असहिष्णुता की बात ही क्या विज्ञान में भी गुण आयेंगे विज्ञान से दुनियां की तबाही विज्ञान में हैं बहुत बुराई विज्ञान से हैं धर्म का नाश विज्ञान हैं एक अभिशाप जब बनेंगे दोनों संगी-साथी तब ना होगी यह बर्बादी दोनों के अवगुण होंगें दोनों गुणों से भरपूर होंगें।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

दीवार ढह गई

जो रोक रखी थी नदियों को कल कल करते झरनों को बाहें पसारे खड़े हैं लोग नदियों का पानी भरने को। कलियां महकेगीं बागों में  सूरज भी चमकेगा उन पर गलियों में उड़ते भैरव का मन लौटेगा पुष्प परागों पर। रात का चंचल चांद अपना होगा दिल का अभिमान अपना होगा  हवाओं का झंकार अपना होगा दिशाओं का प्यार अपना होगा। चाहे घास का तिनका हो  या हो देवदार का वृक्ष रोशनी पड़ेगी सूरज की  सब पर समतीक्ष्ण। सावन में बादल छाएंगे बागों में कोयल गाएंगे मधुर मधुर ध्वनियों फिर प्रकृति के गीत सुनायेगें। चिड़ियों की चाहट से  आकाश में सूरज चमकेगा मंद मंद किरणों में फल कर मध्यकाल में वह दमकेगा।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

होंठ जब खुलते हैं

होंठ जब खुलते हैं,तो  शब्द से गन्ध महकते हैं। किसी के लिए खुशबूदार, तो किसी के लिए बदबूदार। जब तक होंठ मेरे सिले थे, किसी से न शिकवे गिले थे। पर जब ओठ मेरे खुले, तो कुछ अपने और पराए से हुए।                                🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)