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Showing posts from August, 2021

पत्थर की दुनियां

चमकती इमारतों और आलीशान बंगलो चमचमाती सड़कों और सजे हुए गमलों ऊंचे-ऊंचे हाइवे और बड़े-बड़े आडिटोरियम दमकते शहर और पथरीली गालियां कितने प्रतीक हैं, विकास के पूरे या अधूरे या आधे से भी कम या कुछ भी नहीं अब रोशनी भी जहर बन गई हैं अब प्रकृति भी कहर बन गई हैं वीरान जंगल सूनसान है और एक शहर में सब परेशान हैं अब हवा भी मगर बन गई हैं उसके जद में जाओगे तो मारे जाओगे बच भी गए तो भी मारे जाओगे धीरे धीरे और कभी न जान पाओगे भाग रहा है शहर दिन और रात, न भूख न प्यास जिंदगी कितनी सजीव या निर्जीव इसकी कोई न फिकर न बात किसी प्यासे को यहां पानी नहीं किसी भूखे के पेट की कहानी नहीं किसी के दर्द का कोई हमदर्द नहीं किसी रोगी की कोई राते सुहानी नहीं सिर्फ चमकती इटों और कांचो की प्रगति खोखली प्रगति हैं, बेरुखी प्रगति हैं इंसानी संवेदनाओं की अवहेलना इसकी न कोई सद्गति हैं, न सुमति है दोनों साथ हो तो कोई अच्छी बात हो किसी एक से ही न मुलाकात हो नहीं तो हम तबाह होंगे, बेपनाह होंगे हम भी उसी पत्थर की तरह होंगे।

मानव और प्रकृति

उस पार्क की घासें  इस बार काटी नहीं गई थी वें उग कर काफी बड़ी हो गई थी न नई कपोलों सी छोटी और न ही सूखी रूखी सी बूढ़ी अपनी युवता को प्राप्त अपने ओज को प्राप्त एकदम हरी भरी एकदम रंगीन पर थोड़ी सी  अव्यवस्थित और झुकी हुई अपनी गुरूता और अग्रता से मानसून वापसी को आया संग में अपने साथ नम हवाओं को लाया वो हवाएं उन घासों पर कुछ ऐसे लहरा रहीं थी जैसे उनकी पीठ थपथपा रही हो  उनके उस विकास पर कुछ ही को मिलती है उस सुनहरे पार्क में वें थोड़ा सा खुशी से झुक जाती फिर कुछ गर्वता लिए उठ जाती यह क्रम चल रहा था हर पल अनेकों बार, लगातार वहीं हवाएं जब पेड़ों को झकझोरती कुछ तेजी से, कुछ मौजी से वें पेड़ भी उन हवाओं के संग झूमने लगते कुछ शराब के नशे में झूलते इंसानों जैसा उन पेड़ों पर बैठें पंछी उड़ जाते फिर किसी दूसरे पेड़ पर बैठने जाते अब बादल भी सफ़ेद से हो गए हैं रुई के कोमल फाहों जैसे जिनमे रंच मात्र भी कालिमा नहीं वापस जा रहे हैं, फिर आने को बची हुई खुशियां फिर लाने को जब वो बादल फिर काले हो जाएंगे अगले साल फिर तबाही लायेंगे लेकिन अगले साल आने वाली तबाही से  कोई डरा नहीं है, कोई मरा...