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Showing posts from June, 2022

गर्तावास

ये पतले पैर काली चमड़ी सूखे चेहरे कुरूपता के अंश नहीं नंगेपन के दंश नहीं|   ये मेहनती हाथ कइयों के साथ थकी आँख झुलसी पांख कंगाली के हाथ नहीं बदहाली के पास नहीं|   ये करते हैं आजीवन परिश्रम भरते हैं आसुओं से भ्रम जो मिलता हैं खुश रहते हैं न मिले तो बस आह भरते हैं|   फिर लगते हैं पाने को जिंदगी नयी बनाने को बस कुछ ही सफल होते हैं बाकी सब गर्त में रोते हैं|

बुढ़ापा

सांस जाती रहती है, हर पल के साथ| नींद उड़ती रहती है, हर रात के साथ| दिल की धड़कनें कमजोर हो जाती है, नब्ज भी थिरकने लगते हैं, अंधेरी रात और भी लंबी हो जाती है, हर पहर के साथ| सुबह के इंतजार में, नींद भी चलने लगती है| किसी बची हुई सफर पर| जिंदगी के अनुभव, कभी कड़वे से लगते हैं, और कभी मीठे से| कभी-कभी हम, सब कुछ कह जाना चाहते हैं| और कभी-कभी, एक निरंतर खामोशी| किसी स्वप्न के आगोश में, सांसे चलती है, बातें चलती है, राहें बनती है, वो स्वप्न  कभी धूमिल सा, कभी डरावना, कभी उमंगों सा, कभी बिल्कुल सूना| कभी बचपन स्वप्न बनकर चला आता है, और कभी जवानी, कभी मीठी यादें लिए हुए, करुणा भरी कहानीं| अब तो वो कैद हो गए हैं, गुजरे हुए सपनों में, न हाथ आते हैं, न पास| यादें, यादें और बस यादें ही, जिंदगी को कदम देती है, जिंदगी में रंग भरती है, बची हुई राहों में सुगंध भरती है, उसी सुगंध के सहारे, हम आगे बढ़ते हैं, सफ़र करते हैं, बची हुई राहों पर|