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Showing posts from April, 2019

अध्यापिका के मुख से

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की, जिसने हम पर सब कुछ वारा उस भारत देश महान की। एक तरफ है वीर सिपाही जिन्होंने हमारे लिए अपने प्राण लुटाई, सत्य अहिंसा परोपकार प्रेम, दया सत्कार इस देश का है व्यवहार। ऋषियों महर्षियों की भूमि है ये  जिस पर आध्यात्मिकता के पेड़ उगे, और उस पर दया धर्म न्याय, नीति करूणा के हैं फल लगे। कर्तव्य निष्ठ महापुरुषों ने यहां ज्ञान की है दीप जलायी, अंधकार पूर्ण भविष्य से बचने के लिए, जिससे होती है हमारी भलाई। सुंदर फूलों की खुशबू इस धरा को है मकाहते,  तुम भी आओ दूजे के काम हम सब को यही है सिखाते। हरे-भरे पेड़ों की है यह दुनियां जहां खेलती है नन्ही सी मुनिया, जग सारा उसको देखता है बड़े दुलार से और खेल-खेल में दिखाएं उसको दुनियां। यहां पूजी जाती है नारी यही है यहां की दुनियादारी, हर जन से तुम प्रेम करो सबसे तुम रखो अपनी यारी।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

अध्यापिका पर एक कविता

अध्यापिका पर एक कविता कैसे लिखूं मैं और क्या लिखूं जो छात्र कहते है, उसके रूप को लिखूं या दौड़-धूप को लिखूं, उसके जवानी को लिखूं या उसके पीछे छिपी दर्द भरी कहानी को लिखूं। कुछ नवयुवक छात्र उसको प्रेयसी बनाने की सोंच रखते हैं, जबकि देखना चाहिए उन्हें सम्मान की दृष्टि से, उसके कर्तव्यनिष्ठा से, शायद वो छात्र भूल जाते हैं उस गुरु की महिमा, जो उन्हें रास्ता दिखाती है अज्ञान के घने अंधेरे में, हताशा में, निराशा में, सूख चुकी आशा में कल्पना के फूल खिलाती है। कितने संघर्षों के बाद उसने यह प्रतिष्ठा पायी है, इस बात का अंदाजा क्या तुमने कभी लगाई है, सोचो जरा एक बार घर का काम भी सम्भाला, अपना नाम भी सम्भाला, अपनी ममता को भी बचाया, अपने दर्द को भी छुपाया, दिन भर के काम से उसको भी लगती थी थकाई, फिर भी वह रात भर जागकर करती थी पढ़ाई, तब जाकर उसने यह प्रतिष्ठा है पाई।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

प्रकृति से बात

अरे ओ शहरी बाबू जरा सुनो तो तुझे बुला रहे हैं सुबह के ये नजारे, ठंढी हवाओं के फुहारे, उड़ते हुए नभवासी, लहराता हुआ पेड़, निकलता हुआ सूरज, कह रहे हैं तुझसे मेरे साथ भी ज़रा दो पल घूम लो, वन उपवन में न सही छत पर मुझे बुला लो, मैं वहां भी आ जाउंगी, थोड़ा काम करेंगे, थोड़ा आराम करेंगे, थोड़ा मुझसे (प्रकृति सुन्दरी) बातें भी करेंगे, थोड़ा नभवासीओं से मुलाकाते भी करेंगे।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

इन्कलाब मोर्चा

इक़बाल मोर्चा का बस यही एक नारा है देश चले प्रगति पथ पर यही कर्तव्य हमारा है। थककर चलते रहेंगे निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे न नहारेगे  हिम्मत यही संकल्प हमारा है। हर पल कदम बढ़ाएंगे एक नई चेतना लाएंगे बदलेगी दुनिया की तस्वीर यही विश्वास हमारा है। धन के लोभीओं को मन के अभिमानीयों को एक दिन दूर भगायेंगे यही प्रयास हमारा है। गरीबों की झोली में उनका हिस्सा होगा हर घर घर में बस यही किस्सा होगा। दौलत के घमंड में जो रखे हैं अहंकार को अपने तन में वो रोयेगें एक दिन इतना पूरा न हो पायेगा कोई सपना।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बनारस

बनारस की गलियां वर्गाकार चट्टे घुमावदार रास्ते बच्चों का पुकार बड़ों का सत्कार शहरों से सटे गांव गांवों से सटे खेत घाटों की रौनक बातों की धाक दीवारों पर नक्काशी अदभुत है नगरवासी यही है सुबह ए बनारस शाम ए बनारस                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

गंगा का किनार

अपार अनन्त किनार को देखो निर्मल स्वच्छ धार को देखो कितना सुहाना लगता है खजानों का खाजाना लगता है। कभी सांझ के बादलों में छिप जाती है तो कभी आसमान से उतरती हुई लहराती है। बूढ़े बच्चे हो या स्त्री-पुरुष चाहे हो मृत या हो जीवित ये गंगा की अनुपम मझधार करती है हर जन का सत्कार। अनंता की गोद में अपार की खोज में बह रही है ये निरन्तर पवित्र औरनिश्चल-निर्मल। किनारा पकड़ कर चलों आकाश को पहुंच जाओगे एक नयीं दुनिया की सैर कर आओगे।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

रास्ते के कांटे

पुरुष स्त्री पर शासन करना चाहता है, स्त्री बस उसके समकक्ष आना चाहती है, बस यही है अपराध उसका, अपराध नही, घोर अपराध है। जो उसने की कल्पना की, समकक्ष आने के सपनें देखे, क्योंकि स्त्री तो बस उपभोग्य है, निर्बुध्दि है, निर्बल है, नि:सहाय है। यही सोचकर पुरुष कहता है, मेरे बिना तुम कुछ भी नहीं हो, मैं हूं तो तुम हो, मैं हूं तो तुम्हारा जीवन है, मैं हूं तो तुम्हारी सांसे हैं, मैं हूं तो तुम्हारी आंखें है। जो मैं ना रहा तुम्हारे साथ, तो तुमने आगे बढ़ पाओगी, इस कंकड़ी ले दुनिया में, अपना पग न धर पाओगी। हे! संसार की स्त्रीयों, ये भ्रम है, तुम पर राज करने का, पुरुषों का ये धर्म है, यही तो करते आए है अभी तक, आगे भी यही करना चाहते है। दया जो तुम्हारी शक्ति है, ममता जो तुम्हारी भक्ति है, त्याग जो तुम्हारी तपस्या है, विश्वास जो तुम्हारी आस्था है, कौन कहता है कि तुम निर्बल हो, असहाय हो, तुम तो दुनियां में सबसे बलवान हो, तुम अपनी शक्तियों को पहचानों, जो तुम्हारे अंदर छिपी हुई है। बदल डालो, समाज की कुरितियों को जो मानव समाज को खोखला कर रही है, वहीं कुरितियां, कुत्...

अन्धभक्ति

जब फुदकता है, कोई जीव बार बार, बंदर हो या कुत्ता हो, या हो मानव का आकार। उसके गले की रस्सी को, खींचकर देते हैं तान, और उसे बतला देते हैं, कि ये जंजीर ही मेरी ताकत है। जब कोई भी विपक्षी बोलता है, सत्ता की सच्चाई खोलता है, सत्ता के अंधभक्त नौजवान, देते हैं विपक्षी का जंजीर तान। जंजीर को एक नाम दे देते हैं, वह है जातिवाद या धर्मांध, तुममें ही है सारी बुराईं, क्योंकि तुम करना चाहते हो, मेरी पार्टी की सफाईं।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)