एक जीव
आज वह फिर आया था मेरे कमरे में, छुपे हुए चोरों की तरह, मुझे देखते ही भाग जाता है, बेलगाम घोड़ों की तरह। पता नहीं क्यों डरता था, कि मैं जैसे कोई निर्दयी शक्स हूं। उसे बताना चाहता था कि मैं भी उसी तरह अक्स हूं। शायद उस दिन की तस्वीर, आज भी कैद है, उसकी नजर में, मैं कर्कश आवाज में भगा रहा था उसे, वह डरा-सहमा किताबों में छिप गया। फिर भी मैंने उसे ढूंढ कर भगा दिया, मैं निर्दयी हूं ऐसा उसके दिल में घर कर गया। न उससे मेरा कोई द्वेष था ना कोई शत्रुता, बस मैं करना चाहता था अपनी वस्तुओं की रक्षा। पर मेरी किताबों को उसने न कभी कुतरा, इसी बात से वह मेरे दिल में उतरा, मैंने न उसे कभी मारा न ही दुतकारा, क्योंकि वह भी एक जीव था और मैं भी। 🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)