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शहर और जीवन

शहर  एक रेस के मैदान सा जहां दौड़ते रहना ही जीवन है भागते रहना ही लगे रहना ही जब आप थक जाते हैं तो आप उस भीड़ से निकल कर आराम करने बैठ जाते हैं फिर से दौड़ने के लिए या उसे छोड़ देने के लिए शायद हमेशा के लिए पर शहर जीवन नहीं है उस जिया जा सकता है आराम से, धीमी सांसों के साथ भी उस पिया जा सकता है मीठे शर्बत सा, घूट- घूट मिठास का आनंद लेते हुए या गरम चाय सा जलते हुए, फिर संभलते हुए

वो प्यार ही क्या

एक पल के लिए जब किसी पर दिल ठहर जाए वो प्यार ही क्या एक पल में फिर वो किसी और के लिए  मचल जाए वो प्यार ही क्या जिस प्यार को  पाने के लिए न कर सके थोड़ा इंतजार वो प्यार ही क्या जिस प्यार को जीने के लिए न करे खुद को बेकरार वो प्यार ही क्या जो तुम्हारे बिन बोले न समझ सके तुम्हारे निशब्द लफ्ज़ों को वो प्यार ही क्या जब तक न हो दिल परेशान एक पल के दीदार का वो प्यार ही क्या घायल दिल और बेजुबान ओंठ और तड़पती आंखे जब तक न हो ऐसी बातें वो प्यार ही क्या घायल दिल और बेजुबान ओंठ और तड़पती आंखे निशानी है  उस प्यार की जिसमें डूबकर निकलना मुश्किल हो जाता है                       🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

मैं और जिंदगी

गुम हो जाता है मन कभी किसी अंधेरी दरख़्त में जहां से निकलने का न कोई रास्ता मिले खो जाता है मन कभी कुछ बेरहम दर्दो में जो बस जीवन भर दिल को घायल करते हैं लग जाता है मन कभी कुछ आसान से सवालों के जवाब ढूंढने में, पर वो कभी मिलते ही नहीं राह पर राह बना रहे हैं हम पर लक्ष्य ओझल हो रहे हैं लगे हैं जिंदगी को संवारने पर पल पल सब कुछ खो रहे हैं ये जिंदगी क्या कहूं इसे मैं निस्सार कहूं या कहूं बेदर्द कह भी दू तो क्या हो जाएगा जिंदगी जो है रहेगी तो वही ही बदलू इसे मैं या खुद को खुद बदला तो सब छूट गया इसे बदला तो यह टूट गया चाहें मैं रहूं या मेरी जिंदगी तड़प उठती रही जिगर में आग जलती रही सफर में बस कुछ बाकी था तो वो था मुझे आग का खिलाड़ी बनाना                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बुढापा

सांस जाती रहती है हर पल के साथ नींद उड़ती रहती है हर रात के साथ दिल की धड़कनें कमजोर हो जाती है नब्ज भी थिरकने लगते हैं अंधेरी रात और भी लंबी हो जाती है हर पहर के साथ सुबह के इंतजार में नींद भी चलने लगती है किसी बची हुई सफर पर जिंदगी के अनुभव कभी कड़वे से लगते हैं और कभी मीठे से कभी-कभी हम  सब कुछ कह जाना चाहते हैं और कभी-कभी  निरंतर खामोशी किसी स्वप्न के आगोश में सांसे चलती है बातें चलती है राहें बनती है वो स्वप्न  कभी धूमिल सा कभी डरावना कभी उमंगों सा कभी बिल्कुल सूना कभी बचपन स्वप्न बनकर चला आता है और कभी जवानी कभी मीठी यादें लिए हुए करुणा भरी कहानीं अब तो वो कैद हो गए हैं गुजरे हुए सपनों में न हाथ आते हैं, न पास यादें, यादें और बस यादें ही  जिंदगी को कदम देती है जिंदगी में रंग भरती है बची हुई राहों में सुगंध भरती है उसी सुगंध के सहारे हम आगे बढ़ते हैं सफ़र करते हैं बची हुई राहों पर                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

पीला अधूरा सा चांद

आज मेरे सामने, आधी रात को नीम के झरोखों के बीच नीम की पत्तियां हवाओं के जोर से  दबाने का प्रयास कर रही थी उस पीले से अधूरे चांद को। पर वह चांद अडिग सा, अचल सा न दबा, वह पत्तियां के जोर से जब वो अपने आगोश में लेने का प्रयास करती वह थोड़ा पीछे खिसक जाता हवाओं के जोर से वह बादलों में छिप जाता हवाओं की रफ्तार धीमी हो गई पत्तियों का प्रयास फीकी पड़ गई। इस बार चमका था वह चांद थोड़ा आगे बढ़कर थोड़ा और उजाला भरकर और अपनी रफ्तार को निरंतर कर चल पड़ा वह हवाओं को भी पीछे छोड़ने अपनी चमक से दुनियां को निखारने स्वयं को परिपूर्ण बनाने।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बातों बातों में

बातों बातों में दिल के मुलाकातों में ढूंढता हुआ खुद को मैं जिंदगी में बहुत मशहूर पर दिल से बहुत दूर ढूंढता किसी अपने को मन में दबे किसी सपनें को न किसी फैसले की स्थिति न ही दर्द की अनुपस्थिति दिन गुजर जाता है रात गुजर जाती हैं दिल की बात  दिल में ही रह जाती हैं कभी फिर मिला समय  खुद को तो दिल, दिल से ही फिर वही बात दोहराता हैं वही दर्द, वही प्यार वही इंतजार और वही खुमार फिर भी बातों बातों में जिंदगी निकल जाती हैं पर बात पूरी न हो पाती हैं पर आस पूरी न हो पाती हैं

जिन्दगी के रास्ते

जिंदगी से दूर कुसूर उसका या किसी और का न मालूम है उसको न ही किसी और को दोनों एक दूसरे को घायल करते हैं होते हैं घायल दोनों और पता भी नहीं चलता दोनों को दर्द में हंसते है खुशी में रोते है अब को तब  और तब को अब करते है करते करते सीखते है गलतियां संतुष्ट नहीं होते तो फिर करते है कभी कभी तो  कोई रास्ता ही नहीं दिखता पूरी जिंदगी तक जिनको दिख भी जाता है वो उस पर चल नहीं पाते चलते चलते थक भी जाते हैं थक कर आहें भरते  कई तो सिर्फ आहे ही भरते रह जाते हैं जो उठ जाते हैं वो फिर चल पड़ते हैं मंजिल के करीब आने पर कईयों के हौसले टूट जाते हैं कई खुद को संभाल ले जाते हैं किसी अटूट विश्वास से जिंदगी के संघर्षों से सीखे हुए अनुभावों से खुद को जो बचाए रहते है वही कामयाब होते है वहीं मंजिल को छूते हैं फिर एक और मंजिल बनाते हैं फिर उसको पाने चल पड़ते हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)