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आज का युवा

आज का युवा बढ़ रहा है किस ओर  न ही कोई डोर  और न ही कोई छोर अनियंत्रित, अव्यवस्थित  जाने किधर भी चले जाते है  उसी को रास्ता बना जाते है  जो आए उनके पीछे  उनका भी न कोई बिंदु कोर सब कुछ है तबाह कर देते हैं लगी रहती है नया बनाने की होड़ कभी कर्तव्यों को दरकिनार करते हैं कभी मन्तव्यों का सत्कार करते हैं कभी राम का रट लगाते हैं  कभी ईश्वर से कोसों दूर बांधकर कोई आशा  लेकर एक नई अभिलाषा  चल पड़ते हैं वे वीर हीन करने एक नई शुरुआत जीवन के हर एक पड़ाव  सहते घाव, करते बचाव कुछ जीवन को गति दे पाते हैं  कुछ चोटों पर ही जीवन बिताते हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

सूखती संस्कृति

कट रही हैं मिट्टी  उस पेड़ के जड़ों से  रिस-रिस कर बारिश से| बन कर धूल  उड़ रही हैं  हवा के झोंकों से| सूख रहीं हैं जड़ें  क्षण प्रतिक्षण  सूरज की धूप से| रात की चाँदनी  कमजोर कर रही हैं उसे  अपनी शीतलता से| लगें हैं कीड़े जड़ों में आस-पास फैले  गंदगी के ढ़ेरों से| कुछ पागल कुत्ते  कर रहें हैं पीछे  कचरों को, अपने पैरो से| अगली ठंडी में आंव के लिए  अगली वर्षा में बचाव के लिए| वह पेड़ हैं संस्कृति का, सभ्यता का  मनुष्य के मनुष्यत्व का  जीव के जीवत्व का अगली गर्मी में छाँव के लिए|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

समाज के नींव

विश्वविद्यालय के परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों में गुजरने वाले छात्राओं को देखकर वहीं काम करने वाले दो मजदूर एक मां और पंद्रह बरस की उसकी बेटी उन्हें निहार रहे थे अपनी प्यासी आंखो से अपने किस्मत को कोस रहे थे मन के घने अंधेरे में। और वहीं युवा जिनके कंधो पर  समाज की जिम्मेदारियां हैं उन जैसे गरीब, असहाय, अशिक्षित मलिन शरीर वाले मटमैले कपड़ों वाले कोमल मन वाले, पर एक नज़र डालने से भी कतराते हैं। जो अपनी मेहनत और त्याग से पसीने की एक एक बूंद से भूखे पीट से, सूखे ओठ से बदन के दर्द से, माघ के सर्द से बच्चों की चीख से, मांगे हुए भीख से टूटे सपनों से, रूठे अपनों से दिन के अन्धकार से, तन के बुखार से मन की हताशा से, फिर बंधकर एक आशा से समाज को संबृद्ध बनाते हैं और वही उन्नतशील समाज क्यों उनको भूल जाते हैं।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

कबाड़ बिनने वाले

बेकार समझकर हम तुम जिन वस्तुओं को फेक देते हैं उन्ही से वस्तुओं वो लोग  अपना जीवन चलाते हैं। गंदगी समझकर हम जहां पैर रखने से भी कतराते हैं वहीं रहकर वो सभी लोग अपना सारा जीवन बिताते हैं। पोषण न रहे खाने में शोषित रहे जमाने में दो जून की रोटी कमाने में फिरते रहते हैं वो मलखानें में। पास आते देखकर उन्हें हम दूर भाग तो जाते हैं हमसे हुई दशा यह उनकी फिर भी न हम पछताते हैं। मैला कपड़ा, भद्दा सा रंग सूखा सा मुख, झोली संग गंदे हाथों से खाने का ढंग यही है उनके जीवन का संगम।                    🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

भाषा का प्रवाह

भाषा नदी की धार सी निरन्तर बढ़ती चली जाती हैं जब तक कोई सैलाब ना आ जाए पर्वतों को उखाड़-उखाड़ कर वनों को चीर-चीर कर मैदानों को रेत सा बहाकर। जब मानसून चला जाता है पर्वत स्थिर होने लगते हैं वन हरे-भरे से हो जाते हैं और मैदानों को समतल करके कागज पर स्याही सी बहती हैं। मार्ग में आए जब कोई बाधा एक नया मोड़ लेती वह व्याधा फिर से बढ़ चलती हैं नये गगन में, नये चमन में नयी रूप सी, नये बसन्त में नयी कली सी, नये वतन में नयी चमक सी, नये जनम में।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

तब बहेगा पसीना

जब चमचमाती धूप में पैरों से रिक्शा खींचोगे तब बहेगा पसीना। जब भरी दोपहरी में पैर अपने घिसाओगे  तब बहेगा पसीना। जब आग के सामने चूल्हे में रोटी सेंकोगे तब बहेगा पसीना। जब चिलचिलाती धूप में पेड़ों के छांव पड़ेगा सोना तब बहेगा पसीना। जब सुबह शाम फावड़ा लेकर बनाओगे तुम सब खेत मेड तब बहेगा पसीना। जब कोयले के आग के सामने बेचोगे तुम सब छोला-भटुरा तब बहेगा पसीना। जब खाली पेट में तुम्हारे चूहे कूदेंगे  तब बहेगा पसीना। जब दस रुपए बचने के लिए दो तीन किमी पैदल चलोगे तब बहेगा पसीना। AC के कमरों में बैठकर नहीं बहता है पसीना। ख़ुद कूड़ा गिराकर फिर  उसी की सफाई करने पर नहीं बहता है पसीना। रिश्वत के पैसे खा कर नहीं बहता हैं पसीना।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बनता है तमाशा

जब लंगड़ा चलता है एक पैर पर, तब उसका बनता है तमाशा । जब गूंगा बोलता है बेसुरा, तब उसका बनता है तमाशा । जब कागज की कश्ती पर, कोई सागर पार करने के सपने देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब पंछी के पंखों के सहारे, कोई उड़ने  का ख़्वाब देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब एक नादान बालक,  उम्र भर सच बोलने का प्रण ले,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक अंधा आदमी, किसी को राह बताए,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक वृद्ध ख्वाबों के लिए रोए, तब उसका बनता है तमाशा । जब कोई पागल राजगद्दी की भूख बोए, तब उसका बनता है तमाशा ।             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)