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जिन्दगी के रास्ते

जिंदगी से दूर कुसूर उसका या किसी और का न मालूम है उसको न ही किसी और को दोनों एक दूसरे को घायल करते हैं होते हैं घायल दोनों और पता भी नहीं चलता दोनों को दर्द में हंसते है खुशी में रोते है अब को तब  और तब को अब करते है करते करते सीखते है गलतियां संतुष्ट नहीं होते तो फिर करते है कभी कभी तो  कोई रास्ता ही नहीं दिखता पूरी जिंदगी तक जिनको दिख भी जाता है वो उस पर चल नहीं पाते चलते चलते थक भी जाते हैं थक कर आहें भरते  कई तो सिर्फ आहे ही भरते रह जाते हैं जो उठ जाते हैं वो फिर चल पड़ते हैं मंजिल के करीब आने पर कईयों के हौसले टूट जाते हैं कई खुद को संभाल ले जाते हैं किसी अटूट विश्वास से जिंदगी के संघर्षों से सीखे हुए अनुभावों से खुद को जो बचाए रहते है वही कामयाब होते है वहीं मंजिल को छूते हैं फिर एक और मंजिल बनाते हैं फिर उसको पाने चल पड़ते हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बारिश की बूंदे

बारिश की बूंदे शोर नहीं करती तूफानों सी बारिश की बूंदे कहर नहीं ढाहती नदियों सी बारिश की बूंदे नष्ट नहीं करती  बाढो सी बारिश की बूंदे सूखे वृक्षों पर सूखे घासों पर रह गए प्यासों पर ढल कर उन्हें जीवन देती है खुद मिटा कर उन्हें बनती है                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

शांति का दूत

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 वो फूल जुड़ने के लिए आया था शांति का संदेशा लाया था किसी हाथों ने आगे बढ़ाया था किसी और के हाथों में अपने-पन का अहसास के लिए कुछ भूले बातों की याद के लिए  एक फ़रियाद लेकर आया था वो शख्स उस फूल में अपने जज्बात ले कर आया था| बस एक खाता हुई  किसी और की वज़ह से हुई  उसके घमंड और क्रोध से वह फूल जमीं पर जा गिरा उसके प्रतिकार में वह भी उससे जा भिड़ा प्रेंम बचाव की कोशिश में उनके बीच अधमरा क्रोध ज्वालायमान था उस वक्त प्रधान था बल में, तन और मन में| शांति का दूत कोमल मन से युक्त वह श्वेद सा पुष्प पहले मिट्टी से धूमिल  फिर पैरों से उसमे मिल अपना गुण भूल गया मिल मिट्टी में उसी सा हो गया|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

गांव की स्त्री

जिंदगी बीत जाती है, उसकी  चूल्हों में, चौको में  गाय-भैंस के हौदों में  खेत के हरी घासों में  दो बातों के जज्बातों में  चंद पल के मुलाकातों में  पिया मिलन के आसो में  दूर से मुस्कुराने में  रिश्तो को निभाने में  दिल में गहरा एहसास लिए अपनों और सपनों की बात लिए मीठे समयों की याद लिए  सबकी खुशियों की फरियाद लिए पल दो पल की मुलाकात लिए अपने सपनों की आस लिए जिंदगी सपाट और सफेद  निकल जाती है रिश्तो के देश  यही जीवन है उस तन का वो जो गांव की स्त्री हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बातों बातों में

बातों बातों में दिल के मुलाकातों में ढूंढता हुआ खुद को मैं जिंदगी में बहुत मशहूर पर दिल से बहुत दूर ढूंढता किसी अपने को मन में दबे किसी सपनें को न किसी फैसले की स्थिति न ही दर्द की अनुपस्थिति दिन गुजर जाता है रात गुजर जाती हैं दिल की बात  दिल में ही रह जाती हैं कभी फिर मिला समय  खुद को तो दिल, दिल से ही फिर वही बात दोहराता हैं वही दर्द, वही प्यार वही इंतजार और वही खुमार फिर भी बातों बातों में जिंदगी निकल जाती हैं पर बात पूरी न हो पाती हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

आज का युवा

आज का युवा बढ़ रहा है किस ओर  न ही कोई डोर  और न ही कोई छोर अनियंत्रित, अव्यवस्थित  जाने किधर भी चले जाते है  उसी को रास्ता बना जाते है  जो आए उनके पीछे  उनका भी न कोई बिंदु कोर सब कुछ है तबाह कर देते हैं लगी रहती है नया बनाने की होड़ कभी कर्तव्यों को दरकिनार करते हैं कभी मन्तव्यों का सत्कार करते हैं कभी राम का रट लगाते हैं  कभी ईश्वर से कोसों दूर बांधकर कोई आशा  लेकर एक नई अभिलाषा  चल पड़ते हैं वे वीर हीन करने एक नई शुरुआत जीवन के हर एक पड़ाव  सहते घाव, करते बचाव कुछ जीवन को गति दे पाते हैं  कुछ चोटों पर ही जीवन बिताते हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

सूखती संस्कृति

कट रही हैं मिट्टी  उस पेड़ के जड़ों से  रिस-रिस कर बारिश से| बन कर धूल  उड़ रही हैं  हवा के झोंकों से| सूख रहीं हैं जड़ें  क्षण प्रतिक्षण  सूरज की धूप से| रात की चाँदनी  कमजोर कर रही हैं उसे  अपनी शीतलता से| लगें हैं कीड़े जड़ों में आस-पास फैले  गंदगी के ढ़ेरों से| कुछ पागल कुत्ते  कर रहें हैं पीछे  कचरों को, अपने पैरो से| अगली ठंडी में आंव के लिए  अगली वर्षा में बचाव के लिए| वह पेड़ हैं संस्कृति का, सभ्यता का  मनुष्य के मनुष्यत्व का  जीव के जीवत्व का अगली गर्मी में छाँव के लिए|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)