Posts

शांति का दूत

Image
 वो फूल जुड़ने के लिए आया था शांति का संदेशा लाया था किसी हाथों ने आगे बढ़ाया था किसी और के हाथों में अपने-पन का अहसास के लिए कुछ भूले बातों की याद के लिए  एक फ़रियाद लेकर आया था वो शख्स उस फूल में अपने जज्बात ले कर आया था| बस एक खाता हुई  किसी और की वज़ह से हुई  उसके घमंड और क्रोध से वह फूल जमीं पर जा गिरा उसके प्रतिकार में वह भी उससे जा भिड़ा प्रेंम बचाव की कोशिश में उनके बीच अधमरा क्रोध ज्वालायमान था उस वक्त प्रधान था बल में, तन और मन में| शांति का दूत कोमल मन से युक्त वह श्वेद सा पुष्प पहले मिट्टी से धूमिल  फिर पैरों से उसमे मिल अपना गुण भूल गया मिल मिट्टी में उसी सा हो गया|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

गांव की स्त्री

जिंदगी बीत जाती है, उसकी  चूल्हों में, चौको में  गाय-भैंस के हौदों में  खेत के हरी घासों में  दो बातों के जज्बातों में  चंद पल के मुलाकातों में  पिया मिलन के आसो में  दूर से मुस्कुराने में  रिश्तो को निभाने में  दिल में गहरा एहसास लिए अपनों और सपनों की बात लिए मीठे समयों की याद लिए  सबकी खुशियों की फरियाद लिए पल दो पल की मुलाकात लिए अपने सपनों की आस लिए जिंदगी सपाट और सफेद  निकल जाती है रिश्तो के देश  यही जीवन है उस तन का वो जो गांव की स्त्री हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बातों बातों में

बातों बातों में दिल के मुलाकातों में ढूंढता हुआ खुद को मैं जिंदगी में बहुत मशहूर पर दिल से बहुत दूर ढूंढता किसी अपने को मन में दबे किसी सपनें को न किसी फैसले की स्थिति न ही दर्द की अनुपस्थिति दिन गुजर जाता है रात गुजर जाती हैं दिल की बात  दिल में ही रह जाती हैं कभी फिर मिला समय  खुद को तो दिल, दिल से ही फिर वही बात दोहराता हैं वही दर्द, वही प्यार वही इंतजार और वही खुमार फिर भी बातों बातों में जिंदगी निकल जाती हैं पर बात पूरी न हो पाती हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

आज का युवा

आज का युवा बढ़ रहा है किस ओर  न ही कोई डोर  और न ही कोई छोर अनियंत्रित, अव्यवस्थित  जाने किधर भी चले जाते है  उसी को रास्ता बना जाते है  जो आए उनके पीछे  उनका भी न कोई बिंदु कोर सब कुछ है तबाह कर देते हैं लगी रहती है नया बनाने की होड़ कभी कर्तव्यों को दरकिनार करते हैं कभी मन्तव्यों का सत्कार करते हैं कभी राम का रट लगाते हैं  कभी ईश्वर से कोसों दूर बांधकर कोई आशा  लेकर एक नई अभिलाषा  चल पड़ते हैं वे वीर हीन करने एक नई शुरुआत जीवन के हर एक पड़ाव  सहते घाव, करते बचाव कुछ जीवन को गति दे पाते हैं  कुछ चोटों पर ही जीवन बिताते हैं                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

सूखती संस्कृति

कट रही हैं मिट्टी  उस पेड़ के जड़ों से  रिस-रिस कर बारिश से| बन कर धूल  उड़ रही हैं  हवा के झोंकों से| सूख रहीं हैं जड़ें  क्षण प्रतिक्षण  सूरज की धूप से| रात की चाँदनी  कमजोर कर रही हैं उसे  अपनी शीतलता से| लगें हैं कीड़े जड़ों में आस-पास फैले  गंदगी के ढ़ेरों से| कुछ पागल कुत्ते  कर रहें हैं पीछे  कचरों को, अपने पैरो से| अगली ठंडी में आंव के लिए  अगली वर्षा में बचाव के लिए| वह पेड़ हैं संस्कृति का, सभ्यता का  मनुष्य के मनुष्यत्व का  जीव के जीवत्व का अगली गर्मी में छाँव के लिए|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

समाज के नींव

विश्वविद्यालय के परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों में गुजरने वाले छात्राओं को देखकर वहीं काम करने वाले दो मजदूर एक मां और पंद्रह बरस की उसकी बेटी उन्हें निहार रहे थे अपनी प्यासी आंखो से अपने किस्मत को कोस रहे थे मन के घने अंधेरे में। और वहीं युवा जिनके कंधो पर  समाज की जिम्मेदारियां हैं उन जैसे गरीब, असहाय, अशिक्षित मलिन शरीर वाले मटमैले कपड़ों वाले कोमल मन वाले, पर एक नज़र डालने से भी कतराते हैं। जो अपनी मेहनत और त्याग से पसीने की एक एक बूंद से भूखे पीट से, सूखे ओठ से बदन के दर्द से, माघ के सर्द से बच्चों की चीख से, मांगे हुए भीख से टूटे सपनों से, रूठे अपनों से दिन के अन्धकार से, तन के बुखार से मन की हताशा से, फिर बंधकर एक आशा से समाज को संबृद्ध बनाते हैं और वही उन्नतशील समाज क्यों उनको भूल जाते हैं।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

कबाड़ बिनने वाले

बेकार समझकर हम तुम जिन वस्तुओं को फेक देते हैं उन्ही से वस्तुओं वो लोग  अपना जीवन चलाते हैं। गंदगी समझकर हम जहां पैर रखने से भी कतराते हैं वहीं रहकर वो सभी लोग अपना सारा जीवन बिताते हैं। पोषण न रहे खाने में शोषित रहे जमाने में दो जून की रोटी कमाने में फिरते रहते हैं वो मलखानें में। पास आते देखकर उन्हें हम दूर भाग तो जाते हैं हमसे हुई दशा यह उनकी फिर भी न हम पछताते हैं। मैला कपड़ा, भद्दा सा रंग सूखा सा मुख, झोली संग गंदे हाथों से खाने का ढंग यही है उनके जीवन का संगम।                    🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)