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सिक्कों के चिन्ह

  वें नहीं जानते, सिक्कों और नोटों के ऊपर बने चिन्हों का क्या महत्व होता हैं, वे सभी किसलिए बने होते हैं|   पर वो इतना जरूर जानते हैं| इससे उनका जीवन चलता हैं, इससे वें खाना और कपड़े पाते हैं, इससे वें जरूरत की चीजें लाते हैं, इससे वें खुशियां पाते हैं, इससे वें जीवन बनाते हैं|   

मैं और जिंदगी

गुम हो जाता है मन कभी किसी अंधेरी दरख़्त में, जहां से निकलने का न कोई रास्ता मिले|   खो जाता है मन कभी कुछ बेरहम दर्दो में, जो बस जीवन भर दिल को घायल करते है|   लग जाता है मन कभी कुछ आसान से सवालों के, जवाब ढूंढने में, पर वो कभी मिलते ही नहीं|   राह पर राह बना रहे हैं हम पर लक्ष्य ओझल हो रहे हैं, लगे हैं जिंदगी को संवारने पर पल पल सब कुछ खो रहे हैं|   ये जिंदगी क्या कहूं इसे मैं निस्सार कहूं या कहूं बेदर्द, कह भी दू तो क्या हो जाएगा जिंदगी जो है रहेगी तो वही ही|   बदलू इसे मैं या खुद को खुद बदला तो सब छूट गया, इसे बदला तो यह टूट गया चाहें मैं रहूं या मेरी जिंदग|   तड़प उठती रही जिगर में आग जलती रही सफर में, बस कुछ बाकी था तो वो था मुझे आग का खिलाड़ी बनाना|  

जीवन की खोज में

हम अंधों से घूम रहे हैं फिर रहे है, टकरा रहे हैं जीवन की गलियों में हम दुनियां नाप रहे है दुनियां को भांप रहे हैं   हम हाफतें लोगो में बिफरते भोगों में मुस्कुराते ओठों में जीवन को ढूंढ रहे हैं   हम कराह में बची हुई राह में दबी सी आह में बुद्धीमानों की निगाह में जीवन को ढूंढ रहे हैं   जीवन को ढूंढते - ढूंढते अनंत जीवन गुजरे कई युग बीते इसी तरह शायद बीत जायेंगे हजारों साल   जीवन के खोज में जीवन खपे जा रहे हैं नपी जा रही है सांसे फिर भी अधूरा रहा जाता है एक प्रश्न आखिर जीवन हैं क्या   पूरा होने कि उम्मीद में फिर से खपते है असंख्य जीवन ये सिलसिला चलता रहेगा कब तक जब तक कि हम अपने अस्तित्व को न खोज ले।    

गर्तावास

ये पतले पैर काली चमड़ी सूखे चेहरे कुरूपता के अंश नहीं नंगेपन के दंश नहीं|   ये मेहनती हाथ कइयों के साथ थकी आँख झुलसी पांख कंगाली के हाथ नहीं बदहाली के पास नहीं|   ये करते हैं आजीवन परिश्रम भरते हैं आसुओं से भ्रम जो मिलता हैं खुश रहते हैं न मिले तो बस आह भरते हैं|   फिर लगते हैं पाने को जिंदगी नयी बनाने को बस कुछ ही सफल होते हैं बाकी सब गर्त में रोते हैं|

बुढ़ापा

सांस जाती रहती है, हर पल के साथ| नींद उड़ती रहती है, हर रात के साथ| दिल की धड़कनें कमजोर हो जाती है, नब्ज भी थिरकने लगते हैं, अंधेरी रात और भी लंबी हो जाती है, हर पहर के साथ| सुबह के इंतजार में, नींद भी चलने लगती है| किसी बची हुई सफर पर| जिंदगी के अनुभव, कभी कड़वे से लगते हैं, और कभी मीठे से| कभी-कभी हम, सब कुछ कह जाना चाहते हैं| और कभी-कभी, एक निरंतर खामोशी| किसी स्वप्न के आगोश में, सांसे चलती है, बातें चलती है, राहें बनती है, वो स्वप्न  कभी धूमिल सा, कभी डरावना, कभी उमंगों सा, कभी बिल्कुल सूना| कभी बचपन स्वप्न बनकर चला आता है, और कभी जवानी, कभी मीठी यादें लिए हुए, करुणा भरी कहानीं| अब तो वो कैद हो गए हैं, गुजरे हुए सपनों में, न हाथ आते हैं, न पास| यादें, यादें और बस यादें ही, जिंदगी को कदम देती है, जिंदगी में रंग भरती है, बची हुई राहों में सुगंध भरती है, उसी सुगंध के सहारे, हम आगे बढ़ते हैं, सफ़र करते हैं, बची हुई राहों पर|

भूमहीन

लहलहाती खेती अपार धान जिसे देखकर फूला न समाता वह किसान प्रसन्नचित हो या कर्जवान किसान तो ठहरा किसान खाने को तो उगा ही लेता वह पेट भर या आधा पेट या फिर उससे कहीं बहुत ज्यादा समृद्धि की राह पर चुन लिए गए है सारी फलियां खेतों की अब बच गए हैं बस ठूठ ठूठ उन ठूठों में भी कुछ लोग जीवन ढूंढ रहे हैं बिन रहे हैं फलियां बिन रहें हैं बीज जो पड़े हैं जमीं पर सड़ने को तैयार  पेट की भूख कमाने के लिए अपना सर खपा रहें हैं कड़ी धूप में, वे भूमहीन जिसमें झुलसती हैं घासें उबलता हैं पानी क्या झुलसन, क्या तपन क्या महत्व रह जाता हैं इन सबका जब पेट की आग भड़कती हैं जब अंदर की प्यास पनपती हैं फिर बचती हैं मजबूरी बनाने को सबसे दूरी क्या धर्म, क्या मान सम्मान क्या परंपरा, क्या अपमान सब फीके पड़ जाते हैं सब पीछे रह जाते हैं बस भूख मिटाना ही सब धर्मों का मर्म बन जाते हैं

पत्थर की दुनियां

चमकती इमारतों और आलीशान बंगलो चमचमाती सड़कों और सजे हुए गमलों ऊंचे-ऊंचे हाइवे और बड़े-बड़े आडिटोरियम दमकते शहर और पथरीली गालियां कितने प्रतीक हैं, विकास के पूरे या अधूरे या आधे से भी कम या कुछ भी नहीं अब रोशनी भी जहर बन गई हैं अब प्रकृति भी कहर बन गई हैं वीरान जंगल सूनसान है और एक शहर में सब परेशान हैं अब हवा भी मगर बन गई हैं उसके जद में जाओगे तो मारे जाओगे बच भी गए तो भी मारे जाओगे धीरे धीरे और कभी न जान पाओगे भाग रहा है शहर दिन और रात, न भूख न प्यास जिंदगी कितनी सजीव या निर्जीव इसकी कोई न फिकर न बात किसी प्यासे को यहां पानी नहीं किसी भूखे के पेट की कहानी नहीं किसी के दर्द का कोई हमदर्द नहीं किसी रोगी की कोई राते सुहानी नहीं सिर्फ चमकती इटों और कांचो की प्रगति खोखली प्रगति हैं, बेरुखी प्रगति हैं इंसानी संवेदनाओं की अवहेलना इसकी न कोई सद्गति हैं, न सुमति है दोनों साथ हो तो कोई अच्छी बात हो किसी एक से ही न मुलाकात हो नहीं तो हम तबाह होंगे, बेपनाह होंगे हम भी उसी पत्थर की तरह होंगे।