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समाज के नींव

विश्वविद्यालय के परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों में गुजरने वाले छात्राओं को देखकर वहीं काम करने वाले दो मजदूर एक मां और पंद्रह बरस की उसकी बेटी उन्हें निहार रहे थे अपनी प्यासी आंखो से अपने किस्मत को कोस रहे थे मन के घने अंधेरे में। और वहीं युवा जिनके कंधो पर  समाज की जिम्मेदारियां हैं उन जैसे गरीब, असहाय, अशिक्षित मलिन शरीर वाले मटमैले कपड़ों वाले कोमल मन वाले, पर एक नज़र डालने से भी कतराते हैं। जो अपनी मेहनत और त्याग से पसीने की एक एक बूंद से भूखे पीट से, सूखे ओठ से बदन के दर्द से, माघ के सर्द से बच्चों की चीख से, मांगे हुए भीख से टूटे सपनों से, रूठे अपनों से दिन के अन्धकार से, तन के बुखार से मन की हताशा से, फिर बंधकर एक आशा से समाज को संबृद्ध बनाते हैं और वही उन्नतशील समाज क्यों उनको भूल जाते हैं।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

कबाड़ बिनने वाले

बेकार समझकर हम तुम जिन वस्तुओं को फेक देते हैं उन्ही से वस्तुओं वो लोग  अपना जीवन चलाते हैं। गंदगी समझकर हम जहां पैर रखने से भी कतराते हैं वहीं रहकर वो सभी लोग अपना सारा जीवन बिताते हैं। पोषण न रहे खाने में शोषित रहे जमाने में दो जून की रोटी कमाने में फिरते रहते हैं वो मलखानें में। पास आते देखकर उन्हें हम दूर भाग तो जाते हैं हमसे हुई दशा यह उनकी फिर भी न हम पछताते हैं। मैला कपड़ा, भद्दा सा रंग सूखा सा मुख, झोली संग गंदे हाथों से खाने का ढंग यही है उनके जीवन का संगम।                    🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

भाषा का प्रवाह

भाषा नदी की धार सी निरन्तर बढ़ती चली जाती हैं जब तक कोई सैलाब ना आ जाए पर्वतों को उखाड़-उखाड़ कर वनों को चीर-चीर कर मैदानों को रेत सा बहाकर। जब मानसून चला जाता है पर्वत स्थिर होने लगते हैं वन हरे-भरे से हो जाते हैं और मैदानों को समतल करके कागज पर स्याही सी बहती हैं। मार्ग में आए जब कोई बाधा एक नया मोड़ लेती वह व्याधा फिर से बढ़ चलती हैं नये गगन में, नये चमन में नयी रूप सी, नये बसन्त में नयी कली सी, नये वतन में नयी चमक सी, नये जनम में।                      🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

तब बहेगा पसीना

जब चमचमाती धूप में पैरों से रिक्शा खींचोगे तब बहेगा पसीना। जब भरी दोपहरी में पैर अपने घिसाओगे  तब बहेगा पसीना। जब आग के सामने चूल्हे में रोटी सेंकोगे तब बहेगा पसीना। जब चिलचिलाती धूप में पेड़ों के छांव पड़ेगा सोना तब बहेगा पसीना। जब सुबह शाम फावड़ा लेकर बनाओगे तुम सब खेत मेड तब बहेगा पसीना। जब कोयले के आग के सामने बेचोगे तुम सब छोला-भटुरा तब बहेगा पसीना। जब खाली पेट में तुम्हारे चूहे कूदेंगे  तब बहेगा पसीना। जब दस रुपए बचने के लिए दो तीन किमी पैदल चलोगे तब बहेगा पसीना। AC के कमरों में बैठकर नहीं बहता है पसीना। ख़ुद कूड़ा गिराकर फिर  उसी की सफाई करने पर नहीं बहता है पसीना। रिश्वत के पैसे खा कर नहीं बहता हैं पसीना।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

बनता है तमाशा

जब लंगड़ा चलता है एक पैर पर, तब उसका बनता है तमाशा । जब गूंगा बोलता है बेसुरा, तब उसका बनता है तमाशा । जब कागज की कश्ती पर, कोई सागर पार करने के सपने देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब पंछी के पंखों के सहारे, कोई उड़ने  का ख़्वाब देखे, तब उसका बनता है तमाशा । जब एक नादान बालक,  उम्र भर सच बोलने का प्रण ले,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक अंधा आदमी, किसी को राह बताए,  तब उसका बनता है तमाशा । जब एक वृद्ध ख्वाबों के लिए रोए, तब उसका बनता है तमाशा । जब कोई पागल राजगद्दी की भूख बोए, तब उसका बनता है तमाशा ।             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

लेखनी जब भी चलती हैं

स्याह रातों में शब्द उकेरते है जब भी मन को तो वो रात ही लाखों लोगों के जीवन के अधेरें को मिटाती चली जाती हैं। लेखनी जब भी चलती हैं एक नवनिर्माण करती हैं उस रात के लेखनी में सूरज का तेज भी  मंद पड़ जाता है।             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

घमंड

हे धनपतियों कुबेर के समदृश्य हे शक्तिपतियों इन्द्र-दर्प युक्त सिर्फ तुमसे ही यह काल नहीं सिर्फ तुमसे ही यह जीवन नहीं तुम बस एक पांसे हो काल के जब चाहे तुम्हें वह तोड़ दे बुद्धि उसकी है, युक्ति उसकी है जब चाहे तब गति मोड़ दे   भूल से भी इस घमंड में न रहना कि तुम सब कुछ जीत लोगे अंत समय जब आयेगा तुम्हारा घमंड चूर-चूर हो जायेगा विश्वास न हो तो इतिहास देखो अगर फिर भी न हो तो राह देखो जब गिनेंगीं सांसें आखिरी गिनती याद आयेगी तब मेरी यह विनती             🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)