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लिखने एक नयी कहानी को

चल पड़ी है ऐ जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। मगर आगे खड़ी है मुश्किलें, तेरी सारी हस्ती मिटाने को। पर तू मिटा देना इन मुश्किलों को, अपने हौसलें रूपी हथियार से। क्योंकि चल पड़ी है ए जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। तुझें हर पल रोंना पड़ेगा, तुझें अपनों को खोना पड़ेगा। रोते-रोते सूख जाएंगे तेरे आंखो के आंसू, चलते चलते पड़ जाएंगे तेरे पैरों में छाले। क्योंकि चल पड़ी है ऐ जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। कभी टूटते हुए नजर आएंगे तेरे सपने, सभी रूठते हुए नजर आएंगे तेरे अपने। एक दिन छोड़ देंगे ये दुनियां वाले तेरा साथ, पर तू कभी घबराना मत होकर निराश। क्योंकि चल पड़ी है ऐ जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। लाख समस्याएं आएं, फिर भी तेरे कदम न डगमगाए। ये विश्वास बना ले तू, बाकी छोड़ सारी कहानी तू। क्योंकि चल पड़ी है ऐ जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। पराये हो जाएंगे हर अपने, टूट जाएंगे तेरे हर सपने। रूठ जाएगी तुझसे ये दुनियां फिर भी भुला देना तू इनकी कमियां। क्योंकि चल पड़ी है ऐ जिंदगी, तू लिखने एक नयी कहानी को।। तेरी जवानी तुझे लालच दिखाएगी...

है ये इलाहाबाद

खुशियों का समुंदर है ये इलाहाबाद, एक नटखट सा बंदर है ये इलाहाबाद, जगत में निराला है यह ये इलाहाबाद, सभी को प्यारा है ये इलाहाबाद। पतली गलियां और ऊंचे मकान, छाई रहती है सदा यहां मुस्कान, कोई दिन में ही तारे गिन रहा है, कोई मंजिल का रास्ता नाप रहा है। किसी की सांसे अटकी सी पड़ी है, कोई बसंत बहार का आनंद ले रहा है कोई दौड़ा जा रहा है पैसों के पीछे, कोई राम नाम में जीवन बीता रहा है। बड़े अजीब लोग रहते हैं यहां पर, सब के दिलों के करीब रहते हैं यहां पर, कोई खून का रिश्ता नहीं है इनके बीच, भाईचारे के आगे कोई टिकता नहीं है इनके बीच। रिक्शे की रफ्तार, सावन की बौछार, गंगा का किनार, यहां के लोगों का प्यार, सभी को यहां का दीवाना बना देता हैं इस शहर की कुछ आदत है ऐसी कि सब को अपना बना लेता है। कोई पैदल चलते हुए ही हाफ जाता है, तो कोई दौड़कर पूरा रास्ता नाप जाता है, ऐसे भी विचित्र लोग रहते है यहां पर कोई दूसरे के मन को भी भांप जाता है। कुंभ का मेला हो, या फुल्की का ठेला हो, हमेशा भीड़ रहती है यहां, चाहे जितना झमेला हो। जितना घूमोगे इसकी गलियों में, मन की लालसा ब...

बचपना

वो बचपन के दिन, वो बचपन की रातें, अब तो हो गई हैं, सब गुजरी हुई बातें। रातों की चांदनी से चमकता था आंगन, दिन के उजाले में चमकता था आंगन। क्या वो दिन थे, खाना खाते, गाना गाते, मिलकर खूब धूम मचाते, कभी हंसाते, कभी रुलाते। न जिम्मेदारीयां थी, ना बंधन था, सबके चंचल मन, खुला आंगन था। डर था तो प्यार भी जो हमारा खुशियों का संसार था। कितने हंसी थे वो दिन, कितनी हंसी थी वो रातें, बस अब रह गई है, वो सब चिकनी-चुपड़ी बातें। जब याद आते हैं वो दिन, हम भूल जाते हैं खुद को। चले जाना चाहते हैं उस बचपन में, जो था कभी हमारे दिल के आंगन में। चंदा हमसे अठखेलियां करता, रातों को  ठिठोलियां करता, दिनकर हंसी धूप से हमारे खुशियों की झोलियां भरता। कब दिन बीता, कब रात बीती, ना जाने कितनी बरसात बीती। भूल गए हम बचपन को गुजरी हुई रात की भांति। ठंडी हवाओं के फुहारे, सुबह-शाम के वो नजारे, उड़ जाते हैं धूल के संग, बन जाते हैं अतीत के अंग। अब वो बीता जमाना हुआ, बचपना हमसे बेगाना हुआ, यादों के दर्पण में बिम्ब सा गुजरा हुआ अफसाना हुआ।         ...

स्त्री तू कौन है

स्त्री तू कौन है तू क्यों मौन है रह तू मौन देखता हूं तेरा पक्ष लेता है कौन किस पर भरोसा करके बैठी है तु इन नामर्दो पर ये क्या तुझे पहचान दिलाएंगे जो खुद को ही नहीं पहचानते वो क्या तुझे पहचानेंगे तुझे खुद को पहचानना होगा अब बदलना होगा तुझको बदलाव का रास्ता तू पकड़ चल तू होकर बेखबर इज्जत, शोहरत धर्म-दान, मान-सम्मान प्रेम दया ममता क्षमा शील क्षमता जो भी है तेरा तू रख अपने पास न हो उदास, न हो निराश तुझमें कम न हो विश्वास कस ले कमर होकर निडर बदलाव की राह को पकड़ चल तू, आगे बढ़ तु धीरे ही सही पर पग धर तु बदल अपनी चाल कर तु नया कमाल अब तक तु शांत थी करुणा तेरी प्रधान थी पर क्या हुआ उस करूणा का जो तेरी पहचान थी तेरी उसी करुणा का ये निर्लज्ज फायदा उठा रहे हैं तु इसकी सीमा को घटा न कि तु इसको मिटा क्योंकि यही तेरी पहचान है यही तेरी मुस्कान है यही तेरा ईमान है यही तेरा सम्मान है पर सिर्फ इसी के सहारे मत तु चलना बदलाव की राह को होगा पकडना क्योंकि ये नामर्द तुझे इच्छापूरक समझते हैं तुझे ये निर्जिव मूरत समझते हैं अब जवाब दे तु तू ना चाह पर भी तुझे दे...

भगवान तुम हो कहां

भगवान तुम हो कहां, ढूंढ रहा है तुझे यह सारा जहां, फिर भी ना मिला तेरा कोई निशां, अब तू ही दिखा मुझे आगे का रास्ता। मंदिर में ढूंढा, मस्जिद में ढूंढा, चर्च में ढूंढा, गुरुद्वारे में ढूंढा, गलियों में ढूंढा, मकानों में बूढ़ा, खेतों में ढूंढा, बागानों में ढूंढा। पत्थरों में ढूंढा पहाड़ों में ढूंढा, नदियों में ढूंढा से शिवालय में ढूंढा, जहां भी तेरे मिलने की उम्मीद दिखी, मैं उन ख्वाबों ख्यालों में ढूंढा। रात के अंधेरे में ढूंढा, दिन के उजाले में ढूंढा, जहां भी तुम्हारे पद चिन्ह दिखे, मैं उस हिमालय में भी ढूंढा। कल्पनाओं के सारे खयालों में ढूंढा, लोगों के नए मिसालों में ढूंढा, पेड़ की शाखाओं में ढूंढा, मन की आशाओं में ढूंढा। ज्ञानियों के मन में ढूंढा, अज्ञानियों के तन में ढूंढा, तू मिल सके जहां भी, मैं ऐसे वन उपवन में ढूंढा। लोगों की निगाहों में ढूंढा, वफाओं में ढूंढा, लोगों के अल्फाजों में ढूंढा, एहसासों में ढूंढा, पर तू ना मिला मुझे कहीं, क्या मैं मानु तेरा निशा ही नहीं। तुझे गरीब पुकारे अमीर पुकारे, साधु संत और फकीर पुकारे, युवा जन की बात है क्या, ...

उस देश को अब ये क्या हुआ

जिस देश में जन्मे राम, उस देश को अब यह क्या हुआ। जिस देश में जन्मे परशुराम, उस देश को अब यह क्या हुआ। भरत जैसे भाई हुए, युधिष्ठिर जैसे धर्मानुयायी हुए। कर्ण जैसे दानी हुए, भीष्म जैसे स्वाभिमानी हुए। सतयुग से कलयुग तक, वीर पुरुषों की बौछार। कृष्ण हुए, बलराम हुए, भीम जैसे बलवान हुए। एकलव्य जैसे गुरुभक्त हुए, द्रोणाचार्य जैसे शख्स हुए। नकुल जैसे सदाचारी हुए, अर्जुन जैसे धनुर्धारी हुए। फिर भी रुका नहीं अवतार, भगवान ने जन्म लिया बारंबार। जन्म लेकर इस संसार में, यहां के लोगों का किया उद्धार। सत्य,अहिंसा,परोपकार सिखाया, धर्म-कर्म व न्याय बतलाया। फिर भी पूरी नहीं हुई जब उनकी इच्छा, मानवता की भी दे दी दीक्षा।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

हे! गुलाब

हे! गुलाब तु मुरझा जा तुम रुठ जा बैठने न दे इन तितलियों को अपने प्यारी सी पंखुड़ियों पर ये बस तुझे नीरस ही करते रहेंगे इन्होंने तुझे दिया ही क्या तुम जो इनके लिए अपनी सुन्दरता न्योछावर करती हों तुम बार बार इनके लिए अपने को क्यों संवारती हों ये तो तितलियां है तितलियां निर्दयता के रंग में रंगी है कुत्सित इच्छाओं घिरी है तुम्हें सजाने के लिए इनके पास समय कहां आज यहां तो कल वहां किसी रसवन्ती को देखा बदली अपनी वेशभूषा मड़डाने लगे, भिनभिनाने लगे बातों के गीत अलपाने लगे मीठे मीठे ख्वाब सजाने लगे हरियाली के गीत सुनाने लगे पेड़ों के धुन पर लहराने लगे हवाओं की बयार पर सरसराने लगे।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)