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एक संदेश

मैं हूं कठोर पत्थर, तुम हो सुकुमार फूल| टूटूंगा मैं तो बिखर जाऊंगा, पर तुम्हारा नामो-निशां नहीं| मैं रहूंगा अस्तित्व-युक्त, तुम हो जाओगे अस्तित्व विहीन| मेरा प्रभाव बना रहेगा, तुम हो जाओगे प्रभाव-हीन| अपने कण-कण को संयुक्त कर, मैं ले लूंगा एक नया आकार| पर क्या तुम कर सकोगे अपना कोई रूप साकार|  बनो कठोर पत्थर  से तुम,     जरूरत पड़े तो बिखर भी जाओ| पर न लो तुम ऐसा आकार, समय आने पर निखर न पाओ|                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

एक जीव

आज वह फिर आया था मेरे कमरे में, छुपे हुए चोरों की तरह, मुझे देखते ही भाग जाता है, बेलगाम घोड़ों की तरह। पता नहीं क्यों डरता था, कि मैं जैसे कोई निर्दयी शक्स हूं। उसे बताना चाहता था कि मैं भी उसी तरह अक्स हूं। शायद उस दिन की तस्वीर, आज भी कैद है, उसकी नजर में, मैं कर्कश आवाज में भगा रहा था उसे, वह डरा-सहमा किताबों में छिप गया। फिर भी मैंने उसे ढूंढ कर भगा दिया, मैं निर्दयी हूं ऐसा उसके दिल में घर कर गया। न उससे मेरा कोई द्वेष था ना कोई शत्रुता, बस मैं करना चाहता था अपनी वस्तुओं की रक्षा। पर मेरी किताबों को उसने न कभी कुतरा, इसी बात से वह मेरे दिल में उतरा, मैंने न उसे कभी मारा न ही दुतकारा, क्योंकि वह भी एक जीव था और मैं भी।                                    🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

देश की बात

गूंज जाता है दुनियां का हर कोना, मैसेज, व्हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर, रिश्ता नाता घर और परिवार, जाना अंजाना और बेगाना। देते हैं सब लोग हर साल, जनवरी में नववर्ष की बधाई, भूल जाते हैं वो लोग शायद, भारत के नव वर्ष की लड़ाई। नफरत की मंशा नहीं है दोस्त, देश की प्रतिष्ठा की बात है, मनाओं हर धर्म के त्योहार, पर अपने देश के गीत याद रहे। देश भक्त का कर्तव्य निभाओ, भारत के अस्तित्व को बचाओ, तब तुम कहलाओगे सच्चे देशभक्त, बाकी सब दिखावा है, छलावा है।                  🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)

मुसाफिर की तरह

  एक मुसाफिर कि तरह, आया मैं इस जमाने में, अपने नन्हे नन्हे कदमों से। पैरों से चला, हाथों से मिला, देखकर आंखों से दुनियां, मेरा ये नाजुक सा दिल खिला। पापा के गोद में चहका, मां के आंचल में ढहका (रोया), जब चला गया बचपना तो दोस्तों संग मैं बहका। बहकते बहकते जब कदम लड़खड़ाए, तो मुझें सभालाने वो दोस्त साथ आए। हाथ पकड़कर एक दूजे का, चले हम फिर रफ्तार में, ढूंढने कुछ खुशियों को चंद्राकर में। जब आये चांद पर, तो पता चला ये हमें, यहां तो जीवन ही नहीं हैं, तड़पकर मर जाना यहीं हैं। ढूंढ रहे थे जब खुशियां चांद पर, तो याद आने लगा वो बालपन, पर अब क्या कर सकते थे, किसी तरह दिन कटते थे। अपने प्राणों से जब हम दूर हुए, तो दूसरों के सांस हराने को आतुर हुए, इसी छीन झपटी में बुलावा आया काल का, तो फिर हमें याद आया वो बालपन। जब आए थे हम किसी मुसाफिर कि तरह, जब तक रहे हम रहे किसी मुसाफिर कि तरह भटके तो भटके जीवनभर किसी मुसाफिर कि तरह, अब जाना भी हैं किसी मुसाफिर कि तरह। फिर भी एक आस लेके चले हम, कि अगर आये अगले जनम हम, फिर किसी मुसाफिर कि तरह, तो न जाएंगे फिर हैं किसी मु...

क्योंकि मैं बच्चा हूं

समस्याएं जिनसे वो कई, पीढ़ियों से परेशान हैं, उन सब का हल है मेरे पास, पर मेरी कोई नहीं सुनता, क्योंकि मैं बच्चा हूं। मैं कुछ कहता हूं, तो वह हंसकर टाल जाते हैं, यह सोंचकर , क्योंकि मैं बच्चा हूं। मैं क्या जानूं अनुभव, किस चिड़िया का नाम है , मैं क्या जानूं दु:ख-दर्द, मैं क्या जानूं राग-द्वेष, मैं क्या जानूं छल-तकरार, मैं क्या जानूं आदर-सत्कार, मैं क्या जानूं प्रेंम_व्यवहार, मैं क्या जानूं चाकू की धार, क्योंकि मैं बच्चा हूं। बच्चा हूं मैं, यही सोचते हैं ये बड़े लोग, यही सोचते ही रह जाएंगे, जब मैं अपनी निजबुद्धि से, इनके जिंदगी से समस्याओं को उखाड़ फेकूंगा।                                  🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

खोखला ताज

खोखला है, यह धवल ताज, इसमें गूंजती है, कोई आवाज, उन मजदूरों की,असहायों की, भूखें, नंगे, त्रस्त व बेसहारों की। बाहर से तो यह कितना चमकीला है, कि आंखें भी चकाचौंध हो जाती है, अंदर से यह कितना कलिमा युक्त है, सदियों के इतिहास को छुपा लेती है। किसी राजा के प्रेंम की कहानी है यह, कि अमर संस्कृति की निशानी है यह, कई मतभेदों के साए में पल रहा है, अनबूझी अनसुलझी कहानी है यह। दुनियां की सात आश्चयों में है शुमार, सारी दुनियां करती है जिसका दिदार, जब देखा इसे मैंने पहली बार, मेरे मन में आया बस यही विचार। यह तो व्यर्थ है, न इसका कोई अर्थ है, इस पर तो प्रकृति का न कोई अर्क है, यह तो एक तानाशाह के मन का सर्पं है, सिर्फ एक महान प्रेमी कहलाने का दर्प है।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

जसवंत सिंह रावत (1962 युद्ध का एक वीर सेनानी)

एक वीर था वह भी हिंदुस्तान का, जिसने गाथा लिखा भारत महान का, लड़ता रहा जिंदगी भर सुकून के लिए, मर कर जला गया स्वाभिमान के दियें। देश का हर एक-एक आवाज, था गूंज उठा उसकी जय-जयकार में, कर गया था वह एक ऐसा काज, जिसे लाखों न कर पाए संसार में। हिमालय पर घने काले बादल छा रहे थे, भारत और चीन युद्ध के संदेश आ रहे थे, एक दिन भीषण महासंग्राम छिड़ गया, वह भी तीव्र आंधी की तरह भिड़ गया। जब तक उसकी पलटन थी, वह रक्षक था, अकेला होने पर बना काल का भक्षक था, वह अकेला था और तीन सौ दुश्मन, मारा था उसने सब को चुन चुन कर। तीन रात और तीन दिन, बिन खाना-पानी, नींद बिन, लड़ता रहा वह देश के लिए, जीत के सपनें को बना कर दियें। गरीबी में पला, गरीबी में ही मरा, पैसे-पैसे के लिए जीवन भर लड़ा, पर जब आयी देश के सम्मान की बात, भूल गया वह सारे रिश्ते-नाते और मां-बाप। मर कर भी जो करता है सेवा हर क्षण, इस भारत की अपने जब्जे के बल पर, मर कर भी अमर है वह वीर सिपाही, जिसने देश के लिए अपनी जान लुटाई।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास) ...