जसवंत सिंह रावत (1962 युद्ध का एक वीर सेनानी)

एक वीर था वह भी हिंदुस्तान का,
जिसने गाथा लिखा भारत महान का,
लड़ता रहा जिंदगी भर सुकून के लिए,
मर कर जला गया स्वाभिमान के दियें।

देश का हर एक-एक आवाज, था
गूंज उठा उसकी जय-जयकार में,
कर गया था वह एक ऐसा काज,
जिसे लाखों न कर पाए संसार में।

हिमालय पर घने काले बादल छा रहे थे,
भारत और चीन युद्ध के संदेश आ रहे थे,
एक दिन भीषण महासंग्राम छिड़ गया,
वह भी तीव्र आंधी की तरह भिड़ गया।

जब तक उसकी पलटन थी, वह रक्षक था,
अकेला होने पर बना काल का भक्षक था,
वह अकेला था और तीन सौ दुश्मन,
मारा था उसने सब को चुन चुन कर।

तीन रात और तीन दिन,
बिन खाना-पानी, नींद बिन,
लड़ता रहा वह देश के लिए,
जीत के सपनें को बना कर दियें।

गरीबी में पला, गरीबी में ही मरा,
पैसे-पैसे के लिए जीवन भर लड़ा,
पर जब आयी देश के सम्मान की बात,
भूल गया वह सारे रिश्ते-नाते और मां-बाप।

मर कर भी जो करता है सेवा हर क्षण,
इस भारत की अपने जब्जे के बल पर,
मर कर भी अमर है वह वीर सिपाही,
जिसने देश के लिए अपनी जान लुटाई।


                  🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

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