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मुसाफिर की तरह

  एक मुसाफिर कि तरह, आया मैं इस जमाने में, अपने नन्हे नन्हे कदमों से। पैरों से चला, हाथों से मिला, देखकर आंखों से दुनियां, मेरा ये नाजुक सा दिल खिला। पापा के गोद में चहका, मां के आंचल में ढहका (रोया), जब चला गया बचपना तो दोस्तों संग मैं बहका। बहकते बहकते जब कदम लड़खड़ाए, तो मुझें सभालाने वो दोस्त साथ आए। हाथ पकड़कर एक दूजे का, चले हम फिर रफ्तार में, ढूंढने कुछ खुशियों को चंद्राकर में। जब आये चांद पर, तो पता चला ये हमें, यहां तो जीवन ही नहीं हैं, तड़पकर मर जाना यहीं हैं। ढूंढ रहे थे जब खुशियां चांद पर, तो याद आने लगा वो बालपन, पर अब क्या कर सकते थे, किसी तरह दिन कटते थे। अपने प्राणों से जब हम दूर हुए, तो दूसरों के सांस हराने को आतुर हुए, इसी छीन झपटी में बुलावा आया काल का, तो फिर हमें याद आया वो बालपन। जब आए थे हम किसी मुसाफिर कि तरह, जब तक रहे हम रहे किसी मुसाफिर कि तरह भटके तो भटके जीवनभर किसी मुसाफिर कि तरह, अब जाना भी हैं किसी मुसाफिर कि तरह। फिर भी एक आस लेके चले हम, कि अगर आये अगले जनम हम, फिर किसी मुसाफिर कि तरह, तो न जाएंगे फिर हैं किसी मु...

क्योंकि मैं बच्चा हूं

समस्याएं जिनसे वो कई, पीढ़ियों से परेशान हैं, उन सब का हल है मेरे पास, पर मेरी कोई नहीं सुनता, क्योंकि मैं बच्चा हूं। मैं कुछ कहता हूं, तो वह हंसकर टाल जाते हैं, यह सोंचकर , क्योंकि मैं बच्चा हूं। मैं क्या जानूं अनुभव, किस चिड़िया का नाम है , मैं क्या जानूं दु:ख-दर्द, मैं क्या जानूं राग-द्वेष, मैं क्या जानूं छल-तकरार, मैं क्या जानूं आदर-सत्कार, मैं क्या जानूं प्रेंम_व्यवहार, मैं क्या जानूं चाकू की धार, क्योंकि मैं बच्चा हूं। बच्चा हूं मैं, यही सोचते हैं ये बड़े लोग, यही सोचते ही रह जाएंगे, जब मैं अपनी निजबुद्धि से, इनके जिंदगी से समस्याओं को उखाड़ फेकूंगा।                                  🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

खोखला ताज

खोखला है, यह धवल ताज, इसमें गूंजती है, कोई आवाज, उन मजदूरों की,असहायों की, भूखें, नंगे, त्रस्त व बेसहारों की। बाहर से तो यह कितना चमकीला है, कि आंखें भी चकाचौंध हो जाती है, अंदर से यह कितना कलिमा युक्त है, सदियों के इतिहास को छुपा लेती है। किसी राजा के प्रेंम की कहानी है यह, कि अमर संस्कृति की निशानी है यह, कई मतभेदों के साए में पल रहा है, अनबूझी अनसुलझी कहानी है यह। दुनियां की सात आश्चयों में है शुमार, सारी दुनियां करती है जिसका दिदार, जब देखा इसे मैंने पहली बार, मेरे मन में आया बस यही विचार। यह तो व्यर्थ है, न इसका कोई अर्थ है, इस पर तो प्रकृति का न कोई अर्क है, यह तो एक तानाशाह के मन का सर्पं है, सिर्फ एक महान प्रेमी कहलाने का दर्प है।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

जसवंत सिंह रावत (1962 युद्ध का एक वीर सेनानी)

एक वीर था वह भी हिंदुस्तान का, जिसने गाथा लिखा भारत महान का, लड़ता रहा जिंदगी भर सुकून के लिए, मर कर जला गया स्वाभिमान के दियें। देश का हर एक-एक आवाज, था गूंज उठा उसकी जय-जयकार में, कर गया था वह एक ऐसा काज, जिसे लाखों न कर पाए संसार में। हिमालय पर घने काले बादल छा रहे थे, भारत और चीन युद्ध के संदेश आ रहे थे, एक दिन भीषण महासंग्राम छिड़ गया, वह भी तीव्र आंधी की तरह भिड़ गया। जब तक उसकी पलटन थी, वह रक्षक था, अकेला होने पर बना काल का भक्षक था, वह अकेला था और तीन सौ दुश्मन, मारा था उसने सब को चुन चुन कर। तीन रात और तीन दिन, बिन खाना-पानी, नींद बिन, लड़ता रहा वह देश के लिए, जीत के सपनें को बना कर दियें। गरीबी में पला, गरीबी में ही मरा, पैसे-पैसे के लिए जीवन भर लड़ा, पर जब आयी देश के सम्मान की बात, भूल गया वह सारे रिश्ते-नाते और मां-बाप। मर कर भी जो करता है सेवा हर क्षण, इस भारत की अपने जब्जे के बल पर, मर कर भी अमर है वह वीर सिपाही, जिसने देश के लिए अपनी जान लुटाई।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास) ...

मेरा दोगलापन

ये मैं नहीं बोल रहा हूं, ये तो तुम बोल रहे हो, क्योंक यहां मैं मैं न होकर, तुम बनकर बोल रहा हूं। तुम हो कौन? तुम हो सारी दुनियां, तुम हो दुनियां के लोग, तुम हो एक महाजाल। जब मैं मैं होता हूं, तो सिर्फ सत्य बोलता हूं, वह सत्य जो तुम्हें हमेशा, बुरा और कड़वा लगता है। बस तुम यही नहीं चाहते हो, इसलिए मैं तुमसे बात करते वक्त, मैं तुम बन कर बात करता हूं, जो तुम्हें अच्छा लगता है, जिस दिन मैं सत्य बोलूंगा, उस दिन वहां मैं बोलूंगा।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

जीवन क्या है

क्या आपने कभी सोचा है, कि आप क्यों खाते-पीते है, क्यों आप पढ़ते-लिखते है, कोई काम क्यों करते है। सोना, रोना, घूमना-टहलना, आदि क्रियाएं क्यों करते है, शायद उत्तर मिल गया है, कि जीवन जीने के लिए, ये सब करना जरूरी हैं। क्या आपने कभी सोचा है, कि यह जीवन क्या है, हम इस धरा पर क्यों आए है, अपनी इच्छा से, या हमें कुछ पता ही नहीं है। ऐसा क्यों होता है, सोचो एक बार नहीं बार-बार सोचों, क्या इस बार उत्तर मिला, इस बार नहीं मिला ना, तो फिर ढूंढना उत्तर को, सिर्फ सपने ही नहीं मत खोए रहिए, जीवन के इस रहस्य का पता लगाना, आपका भी एक कर्तव्य है। जो आपके जीवन का एकमात्र अंतिम लक्ष्य है।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)

मृत्यु निश्चित है

इस काल के गाल के आगे, किसी की भी नहीं चलती, चले जाओगे सबकुछ छोड़कर, एक दिन वह भी वक्त आएगा। न कोई पैसा, न कोई रुपया, न ही कोई बल काम आएगा, कुछ अच्छे काम कर लो मानव, क्योंकि हम मृत्युलोक के निवासी हैं। परसों बूढ़ी गयीं और काका गए, कल दादी गई और दादा भी गए, मां बाप भी चले जाएंगे एक दिन, मानव जीवन की यही कहानी है। न कुछ लाए थे, न कुछ लेकर गए, जो कुछ बनाए थे तुम्हें देकर गए, यही हाल तुम्हारा भी होगा मानव, क्योंकि हम मृत्यु लोके के निवासी हैं।                   🗒️🖋️🖋️🖋️  शिवमणि"सफ़र"(विकास)