अम्बेडकर जाति संगठन के प्रतीक या वर्गभेद विचारधारा के निर्मूलक (निबंध)

 

          एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन भर समाज की वर्गभेद परम्परा, विभाजनकारी नीतियों समाज की संरचना में समानता के बजाय अंतर लाने वाली सोंच का विरोध करता रहा, उसके सामने हिमालय सा अडिग रहा, जो जीवन भर समाज को ऐसी सोंच से मुक्त करने का प्रयास करता रहा कि  प्रकृति ने हमें जन्मना वर्गीकृत नहीं किया हैं, बल्कि यह समाज समय की विचारधारा कार्य-पद्धति   में परिवर्तन के फलस्वरूप हुआ हैंआज उसको ही एक वर्ग या जाति का आधार बनाने का प्रयास किया जा रहा हैं| उसके विचारों की नीवं पर एक महल खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा हैं| जबकि उसने स्वयं इन विभाजनकारी नीतियों जीवन भर विरोध किया|

 

         इस महल के कामगार वही लोग हैं, जिनके लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया| जिनके लिए अपने जीवन के हर पल को बटोर कर अपने सांसो को संघर्षमय बनाया| उनके अधिकारों और सामाजिक समानताओं के लिए भर्षक प्रयास किया| इन सभी के साथ वो लोग भी हिस्सेदारी बटाने में प्रयासरत हैं| जो समाज में समानता की सोंच रखते हैं, वर्गभेद जातिभेद जैसे जहर से समाज को बचाने के इच्छुक हैं और इसके साथ ही समाज को अपनें स्वछन्द विचारों से नवीन रूप देने का प्रयास कर रहें हैं| जबकि अन्य लोग व्यस्त और खाली व्यक्तियों की तरह दर्शकों की भांति महल को तैयार होते देख रहे हैं| कुछ लोग उसमे कमियाँ  निकाल रहे हैं और कुछ लोग उसकी बुराइयों के साथ अच्छाइयों को भी उजागर कर रहे हैं| कुछ तो उस महल के प्रबल विरोधियों की भांति उग्र रूप अपनाये हुए हैं| जो उनकी सोंच और मान्यताओं के उलट हैं| इसके तार्किक आधार को दरकिनार कर, अपनी सोंच परम्परा, मान्यताओं के खंडित होने पर, उसका प्रबल विरोध करने के लिए मैंदान में उतारे जा रहे हैं|

 

        वर्त्तमान समय में अदूरदर्शिता के कारण, उनके विचारधारा को एक अलग वर्ग का प्रतीक बनाने का प्रयास किया जा रहा हैं, क्योंकि वह किसी एक जाति में पैदा हुयें थे और उन्होंने उसी जाति वर्ग की सामाजिक आर्थिक समानता की वकालत करते रहें| जबकि उन्होंने समाज की इसी जातीय वर्गभेद की विचारधारा का जीवन भर विरोध किया| आज उन्हें ही एक वर्ग का आधार बनाने का प्रयास किया जा रहा हैं| इस समूह को तैयार करने में चन्द लोगों की अपनी व्यक्तिगत विचारधार, इच्छाएं स्वार्थ सम्मलित हैं और असंख्य लोगों की अज्ञानता आँख बंदकर उनपर भरोसा करने के कारण, इससे अल्पकालिक प्रबलता दीर्घकालिक पतनता का आधार तैयार हो रहा हैं| यह विचारधारा इसलिए  तीव्रगति से तैयार हो पा रही हैं,क्योंकि सामाज के अन्य वर्गों का भी यही मानना हैं कि वह किसी एक वर्ग में उत्पन्न हुए थे और उन्होंने जो कुछ भी सामाजिक बदलाव के कार्य किये थे| वह उसी वर्ग तक सीमित रहते हुए, राष्ट्रीय रूप में परणित हुआ|

 

 

        वस्तुत: हमें उनके कार्य सीमा को दरकिनार करके उन कार्यों की जरुरत उसके सामाजिक  लाभ की तरफ ध्यान देंना चाहिए| हालंकि हमें उनके कार्यों विचारों  में खाँमियां  हमेशा ढूढ़ने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए| तभी हम एक उन्नत समाज की संरचना तैयार कर सकते हैं, लेकिन हजारों वर्षों से चली रही जातिभेद परंपरा से हमारा समाज आज भी ग्रसित रहा हैं| जिस कारण किसी व्यक्ति को उसके जाति के आधार पर व्यवहार करने की हमारी आदत सी बन गयी हैं और यह आदत आज भी कमोबेश मात्रा में आवश्यक वैचारिक परिवर्तन हो पाने के कारण, ग्रामीण क्षेत्रों में अपना आधार बनाये हुयें हैं, परन्तु इनमें बहुतायत परिवर्तन देखने को भी मिल रहा हैं| खासकर शहरी क्षेत्रों में, यहाँ नवीन विचारधारा के फलने- फूलने कार्यों की दुरुहता के कारण इस तरह के सोंच में अधिकांशत: कमी आई हैं|

 

 

      अगर हम अभी भी सचेत हुए तो ये नवीन प्रयास पुन: एक नयी विचारधरा वर्ग के रूप में तैयार हो सकते हैं| शायद इनकी अपनी नयी परम्परा का भी विकास होता जाए| समाज एक नयें ढाचें का रूप लेता चला जायें| वस्तुत: नयी व्यवस्था कोई बुरी चीज नहीं हैं, लेकिन इस दृष्टि से तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता हैं कि आज सामाजिक एकीकरण का दौर हैं, वैश्वीकरण, सामुदयीकरण धार्मिक-एकीकरण की ओर कदम बढाया जा रहा हैं| विभिन्न संस्कृतियों उनके परम्पराओं को एकीकृत करके समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया जा रहा हैं| जिसमे सभी मनुष्यों जीवों का स्वतन्त्र अस्तित्व हो,उनके अपने स्वतंत्र कार्य-व्यवहार हो| जिसने वे सभी लोग आत्मिक सूक्ष्मता की ओर प्रति पल अग्रसर हो सके, जातिगत भेदभाव, स्थानीयता प्रांतीयता की भावना, साम्प्रदायिकता रंगभेद तथा आर्थिक-असमानता  में ही अपने समय, बुद्धि मेहनत करते रहे| आज का तो बुद्धिमान मनुष्य इससे दो कदम आगे कके सपने को संजोये हुए हैं, जो हैं- आकाशीय जीवन का एकीकरण|

 

 

        समाज की अलग-अलग विविधताओं ने जहाँ हमें बहुत कुछ सिखाया, जिनके कारण हम आज वर्तमान स्तर तक पंहुच सके| वही उनके एकीकरण के प्रयास में बहुत सी परम्पराएँ नष्ट भी होती आयीं| उदहारण के लिए, मनुष्यों ने क्रमिक विकास के क्रम में कबीलाई जीवन से समुदायीकरण और उससे आगे वर्तमान राष्ट्रीयकरण तक का सफ़र  तय किया| इस विकास क्रम में विभिन्न परम्पराओं को समावेशित करते हुए उन्ही मनुष्यों ने अनगिनत पम्पराओं, मान्यताओं, नियम-कानूनों छोड़ते चले आये|  जो पम्पराएँ आवश्यक रहीं, सिर्फ उन्ही को नवीन विचारधारक के लोगों ने अपनाया अन्य सभी को उसी समय में छोड़ दिया गया| आज हम भी एक नये एकीकरण के दौर में खड़े हैं| हमें भी वही प्रक्रिया का अनुपालन करना चाहिए| जो नियन-परम्पराएँ समाज के सुचारू गति में बाधा बने, उनको प्रयोगों के आधार पर जीवन प्रक्रिया में शामिल कर लेना चाहिए, बशर्ते यह भी ध्यान रहे कि कभी-कभी आसान प्रक्रियाएं भविष्य के लिए काफी दुष्परिणामक भी होती हैं|

 

 

         परन्तु हम अपनी हठवादिता के पुजारी हो गए हैं| जो परम्पराएँ हमें लगातार नुकसान करती चली रही हैं, हम उसे बस इसलिए नहीं छोड़ पा रहे हैं, क्योंकि हमारें समाज के कुछ घमंडी व्यतियों का जातियता के आधार पर श्रेष्ठ रहने का सम्मान खो जायेगा| जिसे अपने से प्राप्त करने में बहुत साड़ी मेहनत लगाती हैं| कभी-कभी अपने बल पर वो सम्मान प्राप्त करने में पूरा का पूरा जीवन भी खर्च हो जाता हैं| जो सम्मान हमें बिना किसी मेहनत से मिला हैं, हम उसे कैसे छोड़े| वस्तुत: जातीय वर्गभेद की विचारधारा उनके सामाजिक-धार्मिक परम्पराओं के खिलाफ नहीं बल्कि स्वयं उन्ही के हित के खिलाफ हैं| अगर यही सम्मान वो सभी लोग अपनी काबिलियत और मेहनत के बल पर प्राप्त करें, तो क्या कभी उन्हे इस सम्मान के छिन जाने का डर रहेगा, अगर वें मेहनत नहीं करतें हैं, तो वो जीवन के हर पल में इसे लेकर डरते रहेंगें और यही वो आलसी लोग हैं, जो पहले भी इस जाति आधारित वर्गभेद को बनायें रखने के प्रबल पक्षधर थे और आज भी हैं| एक ऐसा व्यक्ति जो जीवन के सभी आयामों को भली-भांति समझता हैं, मेहनत को जीवन का प्रमुख आधार मनाता हैं| वो इन सभी अनावश्यक विचारों को पीछे छोड़ कर चला आता हैं| आप को भी अच्छे से समझ लेना चाहिए कि यदि आप में आवश्यकता से अधिक आलस्यता हैं और बिना मेहनत के आप समाज में सम्माननीय बने रहना चाहते हैं इसके लिए आप चाहे जितना भी इसे बनाये रखने के पक्षधर बनें रहे, सामाजिक, आर्थिक अन्य सभी परिवर्तन, आपको या तो समय से पीछे कर देंगें या फिर आपकी विचार प्रणाली को बदल देंगें|

 

       यदि हम बात करे समाज के उस वर्ग की जो सर्वथा स्वयं को सताया दबाया हुआ कहता चला रहा हैं, इस परंपरा को बनाये रखने में कुछ उसकी भी हिस्सेदारी रही हैं| उनकी पहली गलती हैं कि परम्पराओं को ईश्वर निर्मित मानना| परम्पराओं को ईश्वर निर्मित मानने के कारण उन सभी लोगों ने हमेशा के लिए यह धारणा बना ली कि ये जाति-भेद प्राणाली भी ईश्वर निर्मित हैं और इस प्राणाली में कभी बदलाव नहीं किया जा सकता हैं| पूर्वजन्म के कर्मो के फल, इस वर्तमान जन्म में भोगने पड़ते हैं, इस सोंच ने भी इस परंपरा को बनाये रखने में काफी हिस्सेदारी निभाई थी| यह सोंच आज भी जहाँ-जहाँ बनी हैं, वहां पर यह जाति-भेद परम्परा आज भी काफी हद तक कायम हैं| जो लोग कल और आज इस परम्परा से अपने को प्रताड़ित मानते हैं, उन सभी लोगों ने कभी इस जाति-भेद परम्परा की सच्चाई को समझाने की कोशिश नहीं की, कि यह वर्गभेद उनके कार्य-पद्धति तथा आर्थिक स्थिति के फलस्वरूप निर्मित हुई| अगर हम परम्पराओं के स्वरुप को समझे तो हमें ये समझ में आता हैं कि कोई भी परम्परा समाज की आवश्यकताओं से निर्मित होती हैं और उसकी जरुरत ख़त्म होने पर वो सारी परम्पराएँ अपने समय में पीछे छूट जाती हैं| उदहारण के लिए हम देखे तो सतीप्रथा पर्दाप्रथा मध्यकाल में हमारी जरुरत बन गयी थी| परन्तु आज उनकी जरुरत ख़त्म हो गयी तो लोगों से उसे छोड़ दिया| हाँ, ये बात जरुर हैं कि इन परम्पराओं को ख़त्म करने को लेकर बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया, ये वही लोग हैं जो परम्पराओं को भी ईश्वर निर्मित मानते हैं और अपनी हठवादी धार्मिकता के कारण समाज के लिए घातक परम्परों को भी नहीं छोड़ना चाहते हैं|

 

        ईश्वरीय मान्यता के समान ही भाग्यवादी मान्यता भी इस जाति-भेद परम्परा को एक मजबूत विस्तृत स्वरुप प्रदान करने में सहायक रहा हैं| इस समाज में अधिकांश लोगों के मन में बालपन से ही यह सोंच बना दी जाति हैं कि जो कुछ तुम्हारे भाग्य में लिखा हैं, तुम्हें उससे ज्यादा और ही कम मिलेगा| चाहे तुम कितना भी मेहनत कर लो भाग्य से ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा और चाहें तुम कुछ भी करो, अगर तुम्हारे भाग्य में लिखा हैं तो तुम्हे जरुर मिलेगा| ऐसी धारणाएं मनुष्य को कर्मठता तथा परिश्रमशीलता से बहुत दूर कर देती हैं, उसे मन ही मन निराश कर देती हैं| मनुष्य बस भाग्य के भरोसे बैठ जाता हैं और मेहनत को व्यर्थ समझने की भूल कर बैठता हैं जबकि मेहनत के द्वारा वह तत्कालीन परिणाम में परिवर्तन भी कर सकने में समर्थ हो सकता था| उस परिणाम को उससे ज्यादा भी कर सकता था, यदि  परिस्थिति वश उस परिणाम में कमी जाती तो इसे उसकी गलती नहीं समझाना चाहिए| इसी कमी अधिकता को वह मेहनत की अधिकता परिस्थिति वश कमी को सूक्ष्म-दृष्टी से निरिक्षण कर पाने के कारण वह परिणाम को भाग्यवादी दृष्टी से देखने की गलती कर बैठता हैं| यहीं भाग्यवादी मान्यता उसकी वर्तमान स्थिति को बनाये रखने उसमे अधिकाधिक कमी ला देती हैं, जबकि वह इसे मेहनत द्वारा परिवर्तित भी कर सकता था, परन्तु भाग्यवादी मान्यता के कारण मेहनत को व्यर्थ समझ बैठता हैं| यही आलस्यता आज के निम्न वर्गों को उसी स्थिति में बनायें रखने का एक मुख्य कारण हैं|

 

         रही बात शिक्षा की असमानता की या अन्य सभी कुरीतियों या मान्यताओं की, इसमें जितना हिस्सा समृद्ध वर्ग के जाति-भेद परंपरा की सोंच रखने वालों का हैं| शायद उतनी ही गलती इन मान्यताओं को स्वीकार करने वाले लोगों की भी हैं| हमें इस जाति-भेद परंपरा को तोड़ने की शुरुआत करने वालों विदेशी विद्वानों व भारतीय सामाजिक सुधारकों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए| और हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि निम्न लोगों व स्त्रीओं से शिक्षा व धन का अधिकार न देने की गलती जो हमारे वर्णव्यवस्थाकारों से हुई हैं| वह गलती वास्तव में अमानवीय रही हैं| इसकी आलोचना करने से हमें इस दृष्टि से दरकिनार नहीं करना चाहिए कि हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति को नुकसान होगा| गलतियाँ हर मनुष्य करता हैं और जब वही गलती उस समाज के अधिकांश लोग करने लगे तो वह गलती उसके समाज व संस्कृति पर घाव के समान हो जाता हैं| इस घाव की पूर्ति उस बुराई को खत्म करके ही की जा सकती हैं| हमारी प्राचीन संस्कृतियों की बुराइयों को समाज के सामने लाकर, उसका पूर्णदहन करने पर ही हम अपनी संस्कृति को सुदृढ़ बना सकते हैं, न की उसकी बुराइयों को छिपा कर|

 

         शिक्षा जो सभी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व अन्य सभी परिस्थितियों, परंपराओं व मान्यताओं आदि में परिवर्तन लाने का एक मात्र स्त्रोत हैं, समाज को एक स्वस्थ व प्रगतिशील बनाने का मुख्य माध्यम हैं| उसे राष्ट्र के हर एक व्यक्ति तक पँहुचाने का प्रयत्न करना चाहिए| यह शिक्षा डिग्रीधारी नहीं बल्कि व्यति को विचारशील बनाने वाली शिक्षा, जीवन को सरल व सुचारु बनाने वाली शिक्षा| इसको पूर्ण करने के लिए हमें तमाम तरह के सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक तथा मनोगत असमानताओं को दूर करना होगा| तभी हमारे तमाम प्रयास सफल होंगे|

 

 

                                                                              🗒️🖋️🖋️🖋️शिवमणि"सफर"(विकास)|

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